दरअसल, छतरपुर जिला अस्पताल के ओपीडी विभाग में काफी भीड़ लग हुई थी। सभी डॉक्टर चैंबर में बैठकर मरीजों का इलाज कर रहे थे। तभी एक चैंबर के बाहर मरीजों की भीड़ उमड़ पड़ी, लेकिन उस चैंबर में बैठने वाले डॉक्टर हिमांशु बाथम वहां मौजूद नहीं थे। तभी यह मानसिक रोगी वहां पहुंचा और डॉक्टर की सीट पर बैठकर मरीजों को देखना शुरू कर दिया। देखते-देखते उसने दर्जन भर से ज्यादा मरीजों का इलाज कर दिया और उन्हें दवा भी लिख दी।
दवा लेने के लिए जब मरीज सरकारी मेडिकल स्टोर पर पहुंचे तो वहां दवा देने वाले अनूप शुक्ला को एक के बाद एक लाल पेन से लिखे पर्चों को देखकर शक हुआ। इसके बाद उन्होंने मरीजों से डॉक्टर का चैंबर नंबर पूछा और वहां पहुंचे। शुक्ला यह देखकर दंग रह गए कि वहां मानसिक रोगी सीट पर बैठकर मरीजों का इलाज कर रहा है। शुक्ला ने इस बात की जानकारी अस्पताल प्रशासन को दी, जिसके बाद उसे पकड़कर बाहर निकाला गया।
फर्राटेदार अंग्रेजी बोल रहा था, इसलिए लगा यहीं डॉक्टर है: मरीज
मानसिक रोगी ने मरीजों को बताया कि वह दिल्ली के एम्स का डॉक्टर हैं, जिसका नाम डॉक्टर वीर बहादुर है। जब रोगी से पूछा गया कि उसने मरीजों को गलत दवा क्यों लिखी तो उसने कहा कि 100 फीसदी गारंटी लेता हूं, आप दवा चेक करा लीजिए, एकदम सही निकलेगा।
जब उससे पूछा गया कि वह ओपीडी में बैठकर इलाज क्यों कर रहा था तो उसने कहा कि चैंबर खाली देखकर मरीज परेशान हो रहे थे, इसलिए मैंने उनका इलाज करना शुरू कर दिया। इसमें गलत क्या है?
मरीजों ने बताया कि वह इलाज के दौरान फर्राटेदार अंग्रेजी में बात कर रहा था, इसलिए हमें लगा कि वह ही डॉक्टर है। मामला सामने आने के बाद अस्पताल के सामने यह चुनौती थी कि वह उन मरीजों का पता लगाए जिनका इलाज उसने किया था।