मध्यप्रदेश में आदिवासी मतदाताओं को साधने को लेकर अब भाजपा और कांग्रेस में होड़ सी मच गई है। एक तरफ जहां सत्ताधारी भाजपा जनजातीय गौरव दिवस का समापन समारोह 22 नवंबर को मंडला में करने जा रही है। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ भी आदिवासियों को साधने के लिए मैदान में उतर गए हैं। 24 नवंबर को वे आदिवासी विधायकों और 89 ट्राइबल ब्लॉक के पदाधिकारियों के साथ एक बड़ी बैठक करने जा रहे हैं। दोनों ही दलों ने आदिवासियों को साधने की कवायद इसलिए भी तेज कर दी है, क्योंकि राज्य में जल्द ही पंचायत चुनाव होने वाले हैं। इसकी अधिसूचना इसी माह लागू होने की संभावना है। इस चुनाव का परिणाम तय करेगा कि आगामी विधानसभा चुनाव में आदिवासी किसके साथ हैं।
पीएम मोदी के भोपाल में दिए आदिवासी मंत्र के बाद प्रदेश भाजपा ने इस मुद्दे पर नए सिरे से रणनीति बनाना शुरू कर दी है। पार्टी का मुख्य फोकस 2023 के विधानसभा चुनावों पर है। इसी को देखते हुए 25 और 26 नवंबर को भाजपा भी अहम बैठक करने जा रही है। इसमें लोकसभा, राज्यसभा के सांसदों के अलावा सभी केंद्रीय मंत्री भी शामिल होंगे। प्रदेश भाजपा से जुड़े सूत्रों का कहना है कि भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक को लेकर ये माना जा रहा है कि इसमें 15 नवंबर को हुए जनजातीय गौरव दिवस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से दिए गए आदिवासी मंत्र पर खास तौर से मंथन किया जाएगा।
इधर, कांग्रेस भी इस समुदाय को साधने के लिए भोपाल में मंथन करेगी। प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ 24 नवंबर को अनुसूचित जनजाति वर्ग के विधायकों, चुनाव लड़ चुके प्रत्याशी, 89 आदिवासी विकासखंड वाले जिला और ब्लाक अध्यक्षों के साथ बैठक करेंगे। पार्टी सूत्रों के अनुसार, बैठक में चार सौ से ज्यादा आदिवासी वर्ग के नेता जुटेंगे और इसमें त्रिस्तरीय पंचायत, नगरीय निकाय सहित विधानसभा और लोकसभा चुनाव की तैयारियों के साथ आगामी कार्यक्रमों पर बात होगी। वहीं, जनजातीय समुदाय को जोड़े रखने के लिए प्रदेशभर में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इसकी रूपरेखा इस बैठक में बनाई जाएगी।
इसके पहले सितंबर 2021 में पार्टी आदिवासी क्षेत्रों में काम करने वाले विभिन्न् संगठनों को एक मंच पर लाने लिए सम्मेलन कर चुकी है। प्रदेश में 1.56 करोड़ से ज्यादा आदिवासी हैं। 47 विधानसभा क्षेत्र इनके लिए आरक्षित हैं। वर्ष 2018 में कांग्रेस की 15 साल के बाद सत्ता में वापसी आदिवासियों का समर्थन मिलने की वजह से ही हुई थी। पार्टी ने 31 विधानसभा क्षेत्रों में जीत हासिल की थी। इसे मद्देनजर रखते हुए कमलनाथ सरकार ने आदिवासियों की ऋण मुक्ति, अनुसूचित जनजाति वित्त विकास निगम से लिया ऋण माफ करने के साथ गौठान के विकास, आदिवासी के घर जन्म या मृत्यु होने पर निशुल्क खाद्यान्न देने, नौ अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाने और इसके लिए प्रति विकासखंड एक लाख रुपये देने जैसे कदम उठाए थे।
मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार ऋषि पांडेय अमर उजाला से चर्चा में बताते है कि पीएम मोदी के दौरे के बाद से प्रदेश की राजनीति में आदिवासी समाज एकदम से केंद्र में आया है। राज्यभर में 22 फीसदी मतदाता इस समाज से आते हैं। 47 सीटें प्रदेश में आरक्षित हैं और 82 सीटों पर निर्णायक भूमिका में है। मध्यप्रदेश में आदिवासी वोट शुरू से ही कांग्रेस मानसिकता का रहा है। लेकिन 2008 के बाद ये वोट बैंक भाजपा की तरफ शिफ्ट होना शुरू हो गया। 2008 के विधानसभा चुनाव और 2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को आदिवासी सीट पर बहुत ज्यादा फायदा मिला। लेकिन 2018 विधानसभा चुनावों में आदिवासी वोट बैंक बड़ा तबका भाजपा से छिटक कर कांग्रेस के पाले में चला गया। 2019 के लोकसभा चुनाव में तो भाजपा को अच्छी सफलता मिली लेकिन विधानसभा चुनावों में भाजपा को नुकसान हुआ। जिसका परिणाम यह रहा कि पार्टी अपने बलबूते पर सरकार नहीं बना सकी।
वरिष्ठ पत्रकार पांडेय आगे कहते है कि मध्यप्रदेश में पिछड़ा और दलित वोट अगर बंट भी जाए तो कोई दिक्कत नहीं होती है, लेकिन अगर आदिवासी वोट जब बंटता है तो पार्टियों को सरकार से हाथ धोना पड़ता है। 2003 में जब भाजपा उमा भारती के नेतृत्व में सत्ता में आई थी, तब कांग्रेस के मुकाबले भाजपा के पास ज्यादा आदिवासी विधायक थे। इसके बाद से भाजपा को इस वोट बैंक का फायदा मिलता रहा है। इसलिए आदिवासी वोट बैंक की तरफ शिफ्ट होना भाजपा की मजबूरी बन गया है। प्रदेश में आदिवासी वोट बैंक अभी तक किसी भी एक पार्टी की तरफ समर्पित नहीं रहा है।
ऋषि पांडेय बताते हैं कि मध्यप्रदेश में दोनों पार्टियों का खेल इस बात को लेकर है कि प्रदेश में आदिवासियों का वोट बंटे नहीं। कांग्रेस पार्टी भी इस बात को अच्छे से जानती है कि अगर भाजपा को सत्ता में आने से रोकना है तो फिर से आदिवासियों के बीच में पैठ बनानी होगी। क्योंकि प्रदेश में पिछड़ा वर्ग के वोट बैंक पर शुरू से ही भाजपा का कब्जा है। 17 वर्षों के शासनकाल में भाजपा ने तीन मुख्यमंत्री दिए और वे तीनों ही पिछड़ा वर्ग से आते हैं। इसलिए प्रदेश में अब लड़ाई दलित और आदिवासी वोट बैंक को लेकर है। दलित वोट पर अभी भी कांग्रेस पार्टी का कब्जा है। लेकिन अभी कांग्रेस के पास अच्छा मौका है। कांग्रेस नेतृत्व अगर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष या नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी किसी आदिवासी नेता को देता है, तो इसका सबसे ज्यादा फायदा कांग्रेस को विधानसभा चुनावों में देखने को मिल सकता है।
आदिवासी बहुल इस इलाके में 84 विधानसभा क्षेत्र आते हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 84 में से 34 सीटों पर जीत हासिल की थी। वहीं, 2013 में इस इलाके में 59 सीटों पर भाजपा को जीत मिली थी। 2018 में पार्टी को 25 सीटों पर नुकसान हुआ है। वहीं, जिन सीटों पर आदिवासी उम्मीदवारों की जीत और हार तय करते हैं, वहां सिर्फ भाजपा को 16 सीटों पर ही जीत मिली है। 2013 की तुलना में 18 सीट कम हैं। अब सरकार आदिवासी जनाधार को वापस भाजपा के पाले में लाने की कोशिश में जुटी है।