राजनीति में दल बदलने के इस दौर में बालकवि बैरागी की कविता 'अपनी गंध नहीं बेचूंगा' वर्तमान में काफी प्रासंगिक है। लिहाजा हम इसे अपने पाठकों के लिए पेश कर रहे हैं...
चाहे सभी सुमन बिक जाएं
चाहे ये उपवन बिक जाएं
चाहे सौ फागुन बिक जाएं
पर मैं गंध नहीं बेचूंगा-अपनी गंध नहीं बेचूंगा...
सूरज जिसका सर सहलाए उसके सर को नीचा कर दूं?
मुझसे ज्यादा अहं भरी है ये मेरी सौरभ अलबेली
नहीं छूटती इस पगली से नीलगगन की खुली हवेली
सूरज जिसका सर सहलाए उसके सर को नीचा कर दूं?
ओ प्रबंध के विक्रेताओं
महाकाव्य के ओ क्रेताओं
ये व्यापार तुम्हीं को शुभ हो मुक्तक छंद नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं।