मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में इस बार कांग्रेस-भाजपा के बीच जबरदस्त संग्राम मचा हुआ है। तमाम सर्वे दोनों दलों के बीच कांटे की टक्कर का अनुमान जता रहे हैं। भाजपा यहां लगातार 15 साल से सत्ता पर काबिज है और उसके सामने सत्ता बचाए रखने की चुनौती है। कई ऐसी सीटें हैं जहां इस बार जबरदस्त घमासान होना तय है।
इन्हीं में से एक जिला है उज्जैन। 1972 से ही उज्जैन जनसंघ (अब भाजपा) का गढ़ रहा है। 2013 में भाजपा ने यहां की सभी 7 सीटों पर कब्जा जमाया था। लेकिन इस बार सत्ता विरोध लहर में भाजपा के लिए 2013 को दोहराना बेहद मुश्किल नजर आ रहा है। उत्तर उज्जैन से चुने गए ऊर्जा मंत्री पारस जैन यहां 1990 के बाद से चुने जाते रहे हैं। हालांकि 1998 में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था।
जैन और तीन बार के विधायक महिदपुर बहादुर सिंह चौहान को 2013 में जबरदस्त सत्ता विरोधी रुझान का सामना करना पड़ा रहा था, लेकिन फिर भी इन्हें टिकट दिया गया। भाजपा ने यहां दो सर्वे कराए हैं एक निजी कंपनी द्वारा और दूसरा पार्टी स्तर पर। इसके अलावा संघ ने भी अपनी रिपोर्ट भाजपा को दी है जिसमें 70-80 विधायकों के टिकट काटने की बात कही गई है।
दक्षिण उज्जैन से विधायक मोहन यादव भी खतरे में दिख रहे हैं। घट्टिया से विधायक सतीश मालवीय, बड़नगर विधायक मुकेश पांडया के टिकट पर भी संशय है। कुल मिलाकर 7 में से 5 विधायकों के टिकट खतरे में दिख रहे हैं। ऐसे में सबकी नजरें हाईकमान पर टिकी है जहां से उम्मीदवारों की सूची जारी होनी है। इसे लेकर दिल्ली में लगातार माथापच्ची का दौर चल रहा है।