फायदे में हैं दिग्विजय सिंह, शिवराज और भाजपा
उपचुनाव में केवल एक सीट पर भाजपा विधायक मनोहर ऊंटवाल के निधन के कारण उपचुनाव हो रहा है। वरिष्ठ पत्रकार राकेश पाठक का मानना है कि एक सीट भाजपा हार भी जाए तो क्या फर्क पड़ता है। लेकिन यदि 28 सीट में 10 सीट भी भाजपा जीत जाती है, तो उसकी सरकार सत्ता में बनी रहेगी। अनिल जैन भी मध्यप्रदेश की राजनीति पर गहरी पकड़ रखते हैं। सुरेन्द्र सिंह भी मध्यप्रदेश उपचुनाव को लेकर राज्य में लगातार क्षेत्र में बने हुए हैं। सुरेन्द्र सिंह और अनिल जैन दोनों का मानना है कि उपचुनाव के बाद भी भाजपा को कोई नुकसान नहीं होगा। 28 में से भाजपा के 14-16 सीट जीतने के आसार हैं। हां, ग्वालियर चंबल संभाग में उसे झटका लग सकता है। यहां कुल 16 सीटों पर उपचुनाव हो रहा है। इससे दो बात साफ है। पहली तो यह 10 सीटें जीत लेने में सफल रहने पर भाजपा की सरकार बननी तय है। इस स्थिति में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी कुर्सी पर बने रहेंगे। इतना ही नहीं शिवराज को अपने मंत्रिमंडल में खाली हुई जगह को नए नेताओं से भरने का अवसर मिलेगा। ऐसा हुआ तो यह कमलनाथ के लिए दूसरा झटका होगा। वहीं, पर्दे के पीछे से सक्रिय कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह को भी परोक्ष रूप से राजनीतिक फायदा होगा।
दांव पर हैं केवल सिंधिया और कमलनाथ
राजनीति के पंडितों का मानना है कि दांव पर केवल कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं। उपचुनाव में भाजपा की तरफ से ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस से आए सभी प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। ग्वालियर के महाराज खुद कहते हैं कि यह उपचुनाव उनका (महाराज) का है। वह अपने कार्यकर्ताओं को भी यही संदेश दे रहे हैं। इतना ही नहीं इस उपचुनाव में डाबरा की जनसभा में ज्योतिरादित्य सिंधिया के मंच से दिखाई दिए आक्रोश ने भी इसी का संकेत दिया है। समझा जा रहा है कि चुनाव का नतीजा अनुकूल न होने पर जहां ज्योतिरादित्य समर्थक नेता किसी सदन के सदस्य नहीं रह पाएंगे, वहीं इसका असर भाजपा में सिंधिया की भावी राजनीति, उनके दबदबे पर भी पड़ेगा।
इसके सामानांतर कांग्रेस पार्टी ने भी न केवल चुनाव प्रचार का डिजाइन, बल्कि उम्मीदवार भी कमलनाथ की पसंद के ही उतारे हैं। उपचुनाव में कमलनाथ को पार्टी ने पूरी छूट दी है। इसलिए उपचुनाव का नतीजा अनुकूल न आने पर मध्यप्रदेश की राजनीति में कमलनाथ का पैर जमने में आगे दिक्कतें आ सकती हैं। कांग्रेस आईटी सेल के प्रमुख सूत्र का कहना है कि दांव पर कांग्रेस के ही नेता हैं। बस अंतर इतना है कि एक पूर्व हैं और अब भाजपाई बन चुके हैं और एक वर्तमान हैं।