'अल्लाह दे खाने को तो कौन जाए कमाने को।' मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के गांव जैत के कुछ युवा नर्मदा नदी के तट पर यही कहते हुए जमकर ठहाके लगाते हैं।
ये नदी में कुछ अंतराल पर डुबकी लगाते हैं और घाट पर आकर बैठ जाते हैं। बंटी विश्वकर्मा ने मुंह पोंछते हुए पूछा कहां से आए हैं? बंटी के सवाल का जवाब पास में बैठे सोमनाथ चौहान देते हुए कहते हैं, ''देखने आए होंगे मुख्यमंत्री जी का गांव।''
तब तक बंटी विश्वकर्मा नर्मदा में एक और छलांग लगा देते हैं। कुछ दूर तक तैरने के बाद वापस आते हैं और कहते हैं, ''खुद से ही देख लीजिए गांव। इसमें पूछकर क्या जानना है। सब तो दिख ही रहा है। मेरा हाल पूछना चाहते हैं तो जान लीजिए कि नोटबंदी के बाद से गांव आ गया।''
पास में ही दो युवा घाट पर बैठ अपनी चड्डी-बनियान धो रहे हैं। इस बीच सोमनाथ चौहान एक और डुबकी लगाते हुए कहते हैं कि मुख्यमंत्री भी गांव आते हैं तो नदी में नहाते हैं।
सोमनाथ ने बताया कि शिवराज सिंह चौहान तैरकर नदी के दूसरे छोर पर चले जाते हैं।
जैत गांव के एक तरफ पहाड़ है दूसरी तरफ नर्मदा नदी। भोपाल से 70 किलोमीटर दूर शाहगंज और यहां से 18 किलोमीटर की दूरी पर जैत है। शाहगंज से ढाई किलोमीटर की एक कच्ची सड़क जैत जाती है। सड़क दोनों तरफ से धान के खेतों से घिरी हुई है। जैत बुधनी विधानसभा क्षेत्र में है और यहीं से शिवराज सिंह चौहान विधायक बनते हैं।
अगर आपके मन में भारत के बाकी गांवों की तस्वीर है तो इस गांव को भी उसी कसौटी पर देखिए। अगर आप सोचते हैं कि मुख्यमंत्री का गांव है और मुलायम सिंह के गांव सैफई की तस्वीर मन में लिए हुए हैं तो भारी निराशा होगी।
जैत में पहुंचते ही शिवराज सिंह चौहान का घर सबसे पहले दिखता है। घर की दीवार पर चौहान की एक धूल खाती तस्वीर लगी हुई है। चौहान के चाचा के कुछ परिवार के लोग इस घर में रहते हैं। घर के नौकरों ने बताया कि अभी घर पर कोई नहीं है क्योंकि सभी बुधनी विधानसभा क्षेत्र में चुनाव प्रचार के लिए निकले हैं। चौहान का सारा परिवार भोपाल में रहता है।
जैत में नर्मदा के घाट पर एक छोटी सी दुकान है। इस दुकान में पूजा-पाठ का सामान मिलता है। 85 साल की लक्ष्मी बाई दुकान पर बैठी हैं।
लक्ष्मी बताती हैं कि मुख्यमंत्री चाहे जितनी भीड़ में रहें वो उनका पांव छूना नहीं भूलते हैं। ये कहते हुए उनके चेहरे पर जो मुस्कान आती है, वो उम्र के विस्तार पर भारी पड़ जाती है। भले दिन भर में उनकी दुकान से किसी ने नारियल नहीं खरीदा हो लेकिन मुख्यमंत्री के पांव छूने का भाव उन्हें संतोष से भर देता है।