इन चुनावों में फातिमा रसूल सिद्दीकी पर होगी सबकी नजर
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अब आते हैं सबसे दिलचस्प सवाल पर। भाजपा ने फातिमा को क्यों चुना इससे ज्यादा ये सवाल उठ रहा है कि फातिमा ने भाजपा को क्यों चुना। जिस दिन उन्हें पार्टी ने भोपाल उत्तर से टिकट दिया, उससे महज एक दिन पहले वो कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुईं।
फातिमा रसूल सिद्दीकी...इस नाम में एक और गूंज, एक और इतिहास छिपा है। उनके पिता का। रसूल सिद्दीकी, जो पूरी तरह कांग्रेसी थे। इसी सीट से जीते। 1980 और 90 के दशक में कांग्रेस सरकार में मंत्री भी रहे। माधवराव सिंधिया के दोस्त रहे।
तो फिर ऐसा क्या हुआ कि फातिमा भाजपा के खेमे में चली गईं। बीते कुछ दिनों में उनसे ये सवाल कई बार, कई तरह से पूछा गया। ज्यादातर बार उनका जवाब रहा कि अब कांग्रेस पार्टी में पहले जैसी बात नहीं रही।
निकालने वाले इसके कई मायने निकाल सकते हैं और शायद निकालेंगे भी। लेकिन फातिमा ने अपना मन बनाया और भाजपा से टिकट मिलने के बाद जोर-शोर से प्रचार में जुट गईं।
क्या 'भोपाल उत्तर' एक प्रयोगशाला है?
यूं तो भाजपा कभी बहुत मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने के लिए नहीं जानी जाती। लेकिन भोपाल उत्तर सीट अब एक प्रयोगशाला बनती नजर आ रही है। 2019 की प्रयोगशाला। भाजपा की फातिमा रसूल सिद्दीकी के सामने हैं दिग्गज उम्मीदवार कांग्रेस के आरिफ अकील। उनके दम का अंदाजा आप इस बात से लगाइए कि वो 1998 से 2013 विधानसभा चुनाव तक कभी हारे नहीं हैं। हिंदू और मुस्लिम, दोनों में उनकी अच्छी पैठ बताई जाती है। हालांकि, चार बार की एंटी इन्कंबेंसी उनके खिलाफ भी खड़ी है।
राजनीति के पंडितों का मानना है कि भाजपा इस दांव को प्रयोग के तौर पर देख रही है। खुद, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उनके चुनाव कार्यालय का उद्घाटन किया। ट्रिपल तलाक मुद्दे और आम तौर पर मुस्लिम महिलाओं के लिए काम करने की जो छवि भाजपा ने पिछले कुछ वक्त में बनाई है, उसे लगता है कि फातिमा को इसका पूरा फायदा मिलेगा। अगर फातिमा, आरिफ अकील को हराने में कामयाब हो जाती हैं, तो भाजपा 2019 लोकसभा चुनाव में मुस्लिम बहुल इलाकों में मुस्लिम महिलाओं को टिकट देने के फॉर्मूले को आगे बढ़ा सकती है।
इस सीट पर आम से लेकर खास सबकी नजर रहने वाली है। अगर फातिमा ने अकील को हराकर इतिहास रचा तो इसे मध्यप्रदेश चुनाव के सबसे बड़े उलटफेरों में गिना जाएगा।