लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण में मध्य प्रदेश में जिन आठ सीटों पर मुकाबला होना है, वर्ष 2014 में भाजपा ने मालवा-निमाड़ की ये सभी सीटें जीतकर इतिहास बनाया था। लेकिन, विधानसभा चुनावों में मिली सफलता से उत्साहित कांग्रेस कम से कम चार सीटें जीतने की उम्मीद कर रही है। वहीं, भाजपा मोदी के दम पर पिछला नतीजा दोहराने का दावा कर रही है।
उसने छह सीटों पर उम्मीदवार बदले हैं। पश्चिमी मध्य प्रदेश का यह क्षेत्र शुरू से ही आरएसएस के प्रभाव वाला रहा है। चुनाव हो या न हो, संघ व उसके संगठनों की गतिविधियां सतत जारी रहती हैं। भाजपा की असली ताकत भी यही है। वहीं, कांग्रेस और उसका ढांचा आमतौर पर चुनाव के वक्त ही मैदान में दिखता है। कई लोग कहते हैं, कांग्रेस का अभियान वन डे और टी-20 की तर्ज पर होता है।
इंदौरः 30 साल से सिर्फ ताई, इस बार छोड़ी सीट
मप्र की व्यावसायिक राजधानी इंदौर संघ का गढ़ है। लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने 1989 से जीत का जो सिलसिला शुरू किया, वह 30 साल से कायम है। ताई के नाम से मशहूर सुमित्रा इस बार रण में नहीं हैं। ताई के इनकार के बाद भाजपा ने पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान की पसंद व इंदौर विकास प्राधिकरण के चेयरमैन रहे शंकर लालवानी को उतारा। कांग्रेस ने पंकज संघवी को फिर मौका दिया है।
संघवी सीएम कमलनाथ और पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह की पसंद हैं। लोकसभा, विधानसभा और महापौर का चुनाव हार चुके संघवी का यह आखिरी चुनाव है। उन्हें भाजपा की अंदरूनी खटपट का फायदा मिल सकता है। भाजपा के बड़े नेताओं से उनके निजी संबंध लाभ पहुंचा सकते हैं। वहीं, कांग्रेस के लिए भी गुटबाजी बड़ी चुनौती है।
देवास-शाजापुरः जज और लोकगायक में मुकाबला
मौजूदा सांसद मनोहर ऊंटवाल के विधायक बनने के बाद महेंद्र सिंह सोलंकी भाजपा से प्रत्याशी हैं। सोलंकी सिविल जज की नौकरी छोड़कर आए हैं। सोलंकी को भाजपा में बाहरी माना जा रहा है। कांग्रेस के प्रह्लाद टिपानिया भी गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि से हैं। पद्मश्री टिपानिया कबीर के भजनों को गाने के लिए प्रसिद्ध हैं। कांग्रेस को उनकी लोकप्रियता का लाभ मिल रहा है।
उज्जैनः दोनों प्रत्याशी कलह से परेशान
कालभैरव की नगरी में कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही उम्मीदवार अपने दलों में कलह से परेशान हैं। भाजपा ने चिंतामणि मालवीय का टिकट काटकर अनिल फिरोदिया और कांग्रेस ने बापूलाल मालवीय को उतारा है। फिरोदिया विधानसभा का चुनाव हार गए थे। कमोबेश यही आलम बापूलाल मालवीय का है। वे अभी तक कांग्रेसियों के ही उम्मीदवार नहीं बन पाए हैं।
मंदसौरः किसान ही तय करेंगे जीत
किसान आंदोलन के बाद मौजूदा सांसद सुधीर गुप्ता के विरोध के बावजूद भाजपा ने उन्हें टिकट दिया है। दरअसल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ होने के बाद भाजपा ने गुप्ता को उतारा। वहीं, कांग्रेस से पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन किसानों की कथित नाराजगी के कारण उम्मीद देख रही हैं। हालांकि वे चुनाव नहीं लड़ना चाहती थीं। प्रारंभ में वे दौड़ से बाहर बताई जा रही थीं, मगर इधर हालात सुधरे हैं।
खंडवाः पार्टियों के पूर्व अध्यक्षों में मुकाबला
खंडवा में दोनों पार्टियों के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष फिर आमने-सामने हैं। भाजपा से मौजूदा सांसद नंदकुमार चौहान तो कांग्रेस से अरुण यादव मैदान में हैं। पार्टी के भीतर एक खेमा नंदकुमार के विरोध में है। पूर्व मंत्री अर्चना चिटनीस विधानसभा चुनाव की शिकस्त भूल नहीं पा रही हैं। अरुण को भाजपा की कलह से ताकत मिल रही है। उनके भाई कमलनाथ सरकार में मंत्री हैं।
खरगोनः भाजपा में फूट से कांग्रेस को उम्मीद
खरगोन में मौजूदा सांसद सुभाष पटेल की जगह गजेंद्र पटेल को उम्मीदवार बनाया है। सुभाष की नाराजगी भाजपा के लिए परेशानी खड़ी कर सकती है। वहीं, कांग्रेस के डॉ. गोविंद सिंह मुजालदा नया चेहरा हैं। विधानसभा में कांग्रेस ने सात में से छह सीटें जीती थीं।
रतलाम-झाबुआः बेटे के बाद पिता की परीक्षा
आदिवासी बहुल क्षेत्र है। पांच लोकसभा चुनाव जीत चुके कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया, भाजपा विधायक जीएस डामोर के खिलाफ कड़े संघर्ष में हैं। डामोर ने विधानसभा चुनावों में कांतिलाल के बेटे विक्रांत को हराया था। डामोर कहते हैं, अब पिता की बारी है।
धारः आदिवासी वोटर पर टिका फैसला
धार में कांग्रेस ने पहले तीन बार सांसद रहे गजेंद्र सिंह राजूखेड़ी का नाम घोषित किया, लेकिन बाद में दिनेश गिरवाल को उम्मीदवार बना दिया। वे भील हैं और कहा जाता है कि धार से भिलाला आदिवासी ही जीतता है। भाजपा के छतर सिंह दरबार के साथ भी यही दिक्कत है। दरबार को सावित्री सिंह ठाकुर का पत्ता काटकर प्रत्याशी बनाया गया है।