पद्मश्री डॉ डाबर पंचतत्व में विलीन
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डॉक्टर के पेशे को मानव सेवा का माध्यम मानने वाले पद्मश्री डॉ एमसी डाबर का 79 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार गुप्तेश्वर मुक्तिधाम में ससम्मान किया गया। समाज के सभी वर्गों के लोग उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए। और श्रृध्दांजलि अर्पित की। उन्होंने कभी डॉक्टर के पेशे से आर्थिक लाभ नहीं कमाया। जबलपुर के हाथीताल क्षेत्र निवासी डॉ. एम. सी. डाबर डाक्टरी के पेशे को मानव सेवा का माध्यम मानते थे। वह सिर्फ 20 रूपये फीस लेकर मरीजों का इलाज करते थे। उनके निधन की खबर से चिकित्सक वर्ग सहित समाज के सभी वर्गों में शोक व्याप्त है। उनका जन्म 16 जनवरी 1946 को पंजाब पाकिस्तान में हुआ था। विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आ गया था। उन्होंने जबलपुर मेडिकल कॉलेज से साल 1967 में एमबीबीएस (बैचलर ऑफ मेडिसिन एंड बैचलर ऑफ सर्जरी) की पढाई पूरी की। इसके बाद भारत-पाक युद्ध के दौरान साल 1971 में लगभग एक साल तक भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दी।
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वे 1972 में जबलपुर आ गए। इसके बाद बहुत मामूली शुल्क पर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने लगे। उन्होंने 2 रुपये में लोगों का इलाज शुरू किया था। इसके बाद 5,10, 15 और फिर 20 रुपये फीस लेकर मरीजों का इलाज करते रहे। वर्तमान में वह फीस के रूप में सिर्फ 20 रुपये लेते थे। मानव सेवा के लिए उनका समर्पण देखकर केन्द्र सरकार ने 74 वें गणतंत्र दिवस पर उन्हें पद्म श्री सम्मान से सम्मानित किया गया था।
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नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ नवनीत सक्सेना ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा है कि वह सभी चिकित्सकों के लिए आदर्श थे। चिकित्सक के पेशे में आने वाले डॉक्टरों को उनके मानवीय भाव से सीखना चाहिए। उन्होंने डॉक्टरी के पेशे को कभी भी रुपये कमाने का माध्यम नहीं बनाया। उन्होंने डॉक्टर के रूप में सदैव मानव समुदाय के लिए सेवा प्रदान की। जबलपुर सीएमएचओ डॉ. संजय मिश्रा का कहना है कि उनका निधन समाज के सभी वर्गों के लिए अपूर्णीय क्षति है। वर्तमान समय में भी वह फीस के रूप आने वाले मरीजों से सिर्फ 20 रुपये लेते थे। उनके क्लीनिक में पानी भरा होने के बावजूद भी मरीजों का उपचार करते थे।