नायब तहसीलदार द्वारा हाईकोर्ट के आदेश की गलत व्याख्या करते हुए आदेश पारित कर दिए गए। जिसे गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट के जस्टिस जी एस अहलूवालिया की एकलपीठ ने नायब तहसीलदार पर पचास हजार रुपये की कॉस्ट लगाई है। इसके अलावा एकलपीठ ने नायब तहसीलदार के खिलाफ अवमानना का केस दर्ज करने के आदेश दिए हैं।
गोरखपुर निवासी प्रवीण गुप्ता की तरफ से दायर की गई याचिका में कहा गया था कि उसने तथा उसकी बहनों ने अपनी मां शंकुन्तला के नाम पर एक दुकान का हिस्सा छोड़ दिया था। मां ने अनावेदक मनोज कुमार तथा मुकेश तडपडे को उक्त दुकान बेच दी थी। दुकान में कब्जा के लिए पुलिस बल उपलब्ध करवाने के लिए अनावेदकों ने आवेदन दिया था, लेकिन पुलिस बल उपलब्ध नहीं होने पर उन्होंने हाईकोर्ट की शरण ली थी। हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ अनावेदकों ने रिव्यू याचिका दायर की थी। रिव्यू याचिका की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पुलिस अधीक्षक को अनावेदकों के अभ्यावेदन का निराकरण करने के निर्देश दिए थे।
नायब तहसीलदार गोरखपुर ने हाईकोर्ट द्वारा पारित रिव्यू याचिका का हवाला देते हुए बिना डिग्री पारित किए अनावेदकों को कब्जा देने का आदेश जारी कर दिया। याचिका में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए कहा गया था कि अतिक्रमणकारी भी हैं, इसलिए उचित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए था। नायब तहसीलदार ने रिव्यू याचिका की गलत व्याख्या करते हुए उक्त आदेश जारी किए हैं। हाईकोर्ट ने कब्जा दिलवाने के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं किया था।
एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि नायब तहसीलदार ने अपने आदेश में रिव्यू याचिका में पारित आदेश का उल्लेख करते हुए कब्जा प्रदान करने का आदेश जारी किया है। हाईकोर्ट ने कब्जा प्रदान करने के संबंध में कोई आदेश जारी नहीं किया था। एकलपीठ ने नायब तहसीलदार के इस कृत्य को गंभीरता से लेते हुए उक्त आदेश जारी किए।