मध्यप्रदेश हाईकोर्ट नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता का गर्भपात एमटीपी अधिनियम के तहत किए जाने की सुनवाई संज्ञान याचिका पर की गई। हाईकोर्ट ने याचिका की सुनवाई करते हुए अपने आदेश में कहा है कि दुष्कर्म पीड़िता की एमएलसी में वह गर्भवती पाई जाती है तो संबंधित थाना प्रभारी इस संबंधित जिला न्यायालय को सूचित करेंगे। जिला न्यायालय गर्भावस्था समाप्त करने के लिए पीड़िता को संबंधित चिकित्सा अधिकारी और बोर्ड के समक्ष भेजेगा, जिससे पीड़िता के गर्भपात के संबंध में शीघ्र रिपोर्ट प्राप्त हो सके। हाईकोर्ट जस्टिस विशाल घगट ने अपने आदेश में कहा है कि एमटीपी अधिनियम के प्रावधानों में समय महत्वपूर्ण है।
इंदौर हाईकोर्ट द्वारा पारित एक आदेश को संज्ञान में लेते हुए एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि गर्भपात की लिए आवेदन पेश किया गया हो या नहीं किया गया हो। इस संबंध में संबंधित न्यायालय को आवश्यक रूप से यह कार्रवाई करना है। मेडिकल रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद जिला न्यायालय पीड़िता और उसके माता-पिता को सूचित संबंधित उच्च न्यायालय रजिस्ट्री को उसे प्रेषित करें। उच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रीट याचिका के रूप में मामले को संज्ञान लेकर पंजीकृत करेगी। उच्च न्यायालय प्रकरण को रोस्टर वाली संबंधित पीठ के समक्ष तुरंत सूचीबद्ध करें, जिससे गर्भावस्था की समाप्ति के संबंध में उचित आदेश बिना किसी अनावश्यक देरी के पारित किए जा सके।
एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि एमटीपी अधिनियम, 1971 की धारा 3 (2) (बी) के अनुसार, गर्भावस्था की अवधि 24 सप्ताह से अधिक नहीं होने पर दो पंजीकृत चिकित्सा चिकित्सकों (आरएमपी) द्वारा गर्भावस्था को समाप्त किया जा सकता है। अधिनियम के प्रावधानों के तहत गर्भपात केवल तभी होगा जब गर्भावस्था के जारी रहने से गर्भवती महिला के जीवन को खतरा हो सकता है या उसके शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर चोट लग सकती है। इसके अलावा इस बात का पर्याप्त जोखिम है कि यदि बच्चा पैदा होता है तो उसे कोई गंभीर शारीरिक या मानसिक असामान्यता हो सकती है।
एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि एमटीपी अधिनियम, 1971 के प्रावधानों में यह निर्धारित किया गया है कि दुष्कर्म के कारण गर्भवती होना पीड़िता के मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चोट मानी जाएगा। एमटीपी अधिनियम के नियम 3बी में गर्मपात के लिए महिलाओं की तीन अलग श्रेणियों में रखा गया है। यौन उत्पीड़न या बलात्कार या अनाचार की उत्तरजीवी महिलाएं, जिसनी गर्भावस्था 24 सप्ताह से कम है, इसके अंतर्गत आती हैं। ऐसे मामलों में गर्भावस्था को समाप्त करने के लिए न्यायालय के आदेश की आवश्यकता नहीं है। अधिनियम के दायरे में आने वाले सभी उपरोक्त मामलों में गर्भावस्था को समाप्त किया जा सकता है। न्यायालय से अनुमति केवल उन मामलों में आवश्यक है जहां गर्भावस्था 24 सप्ताह से अधिक होगी।
एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि वर्तमान मामले में भ्रूण 6-7 सप्ताह का है। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार उच्चतर केंद्र अर्थात मेडिकल कॉलेज, रीवा में गर्भपात कराना सुरक्षित रहेगा। एकलपीठ ने डॉक्टरों की विशेष टीम के मार्गदर्शन में शीघ्र गर्भपात करवाने की अनुमति प्रदान करते हुए याचिका का निराकरण कर दिया। एकलपीठ ने आदेश की प्रति महाधिवक्ता कार्यालय, रजिस्ट्रार जनरल तथा चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव को भेजने के आदेश जारी किये है।