हाईकोर्ट ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निराकरण करते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने अनावेदक को अपनी इच्छा अनुसार जीवन जीने की अनुमित प्रदान कर दी। वह माता-पिता के साथ नहीं रहना चाहती थी, उसे पति संग रहना था।
बता दें कि सतना निवासी भाई की तरफ से उक्त बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई थी। इसमें उसने आरोप लगाते हुए कहा था कि अनावेदक युवक ने उसकी बहन को बंधक बना रखा है। याचिका की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट को पुलिस को निर्देशित किया था कि वह कॉपर्स को न्यायालय के समक्ष पेश करे। हाईकोर्ट के आदेश पर पुलिस द्वारा कॉपर्स को न्यायालय के समक्ष पेश किया गया था। कॉपर्स की पहचान छुपाने के लिए याचिका की सुनवाई के दौरान लाइव स्ट्रीमिंग बंद करवा दी थी। कॉपर्स ने युगलपीठ को बताया कि वह व्यस्क है और अपने पति के साथ रहना चाहती है। वह अपने माता-पिता के साथ नहीं जाना चाहती है।
हाईकोर्ट जस्टिस जीएस अहलूवालिया तथा जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल की युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि याचिकाकर्ता ने लड़की के नाबालिग होने के संबंध में याचिका दायर नहीं की है। कॉपर्स की इच्छा अनुसार उसे अपने जीवन जीने की अनुमति प्रदान की जाती है।