सिलिंडर कि किल्लत से दूर यह गांव, जहां बायोगैस पर बन रहा खाना
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देश में गैस सिलिंडर की किल्लत के चलते जहां कई जगह लोगों को गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है, वहीं जबलपुर के एक गांव में लोगों को इस समस्या से कोई फर्क नहीं पड़ता। गांव के कई परिवारों ने अपने घरों में बायोगैस प्लांट लगा रखा है, जिससे उन्हें आसानी से ईंधन मिल जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि सिलिंडर की झंझट से बेहतर है कि थोड़ी सी मेहनत कर बायोगैस से ही चूल्हा जलाया जाए।
जबलपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर ग्राम बंदरकोला में लगभग 400 परिवार रहते हैं। इनमें से करीब 60 से अधिक परिवारों के घरों में बायोगैस प्लांट लगा हुआ है। गांव के उपसचिव घूरसेन लोधी ने बताया कि करीब सात साल पहले एक एनजीओ की मदद से गांव में तीन घन मीटर क्षमता के बायोगैस प्लांट लगाए गए थे। हितग्राहियों को केवल मजदूरी का खर्च देना पड़ा था। बायोगैस प्लांट में 10 से 15 किलो गोबर डालने पर इतना गैस तैयार हो जाता है कि कई परिवारों का खाना बन सके।
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गांव के कृष्णा पटेल ने बताया कि बायोगैस प्लांट से निकलने वाले गोबर का उपयोग खेतों में जैविक खाद के रूप में किया जाता है। इससे किसी प्रकार का धुआं भी नहीं निकलता, जिससे पर्यावरण को भी नुकसान नहीं होता। उनके घर में पिछले पांच वर्षों से बायोगैस से ही खाना बन रहा है।
वहीं गांव में रहने वाली हेमबाई पटेल का कहना है कि उनका संयुक्त परिवार है और उनके घर के साथ देवरानी के घर में भी बायोगैस से खाना बनाया जाता है। सुबह के समय बायोगैस प्लांट में गोबर डालने में थोड़ी मेहनत लगती है लेकिन इसके बाद दिनभर चूल्हा आसानी से जलता रहता है।
सुनीता पटेल का कहना है कि बायोगैस प्लांट होने से उन्हें गैस सिलिंडर पर खर्च नहीं करना पड़ता। हालांकि बारिश के मौसम में गैस थोड़ा कम बनती है और कभी-कभी प्लांट में तकनीकी दिक्कत भी आ जाती है लेकिन कुल मिलाकर बायोगैस प्लांट आर्थिक रूप से भी मददगार है और सिलिंडर की किल्लत से भी राहत देता है।