यह दुनिया शोरगुल से भरी है। निरंतर नोटिफिकेशन की आवाज़। कार्यस्थल पर निकट आती ‘डेडलाइन’। बार-बार होने वाली ‘मीटिंग’। अकेले होने पर भी, मन अतीत और भविष्य की चिंताओं से भरा रहता है। यह कभी शांत ही नहीं बैठता। क्या इस ई-मेल का उत्तर तुरंत नहीं दिया तो कुछ हानि हो जाएगी? क्या इस मीटिंग में मेरा प्रभाव सकारात्मक रहेगा? ऐसे ही कई प्रश्न हमारे मन को भयभीत और चिंताग्रस्त रखते हैं। लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है, मन किससे भाग रहा है?
रमण महर्षि और जे. कृष्णमूर्ति ने मात्र यह प्रश्न ही नहीं उठाया कि मैं कौन हूं? उन्होंने इससे भी अधिक सत्य उजागर किया- जो बेचैन करने वाला, लेकिन मुक्तिदायक है। उन्होंने बताया कि मन वास्तव में शांति नहीं चाहता; बल्कि, वह स्थिरता से डरता है। वह गतिमान है और उसी से पोषित होता है। वैसे ही जैसे नदी सूखने से भयभीत होती है। तेज़ी से बहने वाली नदी जैसे ही धीमी होती है, उसे अपनी कमज़ोरी का एहसास होने लगता है। इसी प्रकार, करोड़ों विचारों से भरा यह मन भी भागता रहता है- विचारों, विकर्षणों, इच्छाओं का पीछा करता है-कभी भी रुकने और भीतर की ओर देखने की हिम्मत नहीं करता।
आप शाश्वत शुद्ध चेतना हैं, साक्षी हैं, आपको किसी की आवश्यकता नहीं है, आनंद से जिएं
लेकिन, स्थिरता मन के लिए इतनी भयावह क्यों है? क्योंकि स्थिरता स्वयं के भ्रम को प्रकट करती है। रमण महर्षि अक्सर साधकों को मौन अभ्यास करवाते थे। वह विस्तृत तकनीकों या जटिल दर्शन के बजाय, बस पूछते थे - “ये विचार किसके मन में उठते हैं?” साधक, जो शुरू में अपने आत्म-बोध में आश्वस्त होता था, खुद को अनिश्चितता में घिरा हुआ पाता था। अगर, विचार "मेरे" लिए उठते हैं, तो यह "मैं" कौन है? और अगर यह "मैं" वास्तविक है, तो यह लगातार क्यों बदलता रहता है? यह सोचने पर ही मन घबराता है। यह स्थिरता चाहता है, लेकिन इसे कोई स्थिरता नहीं मिलती। यह स्वयं को परिभाषित करना चाहता है, लेकिन हर परिभाषा असफल रह जाती है। जिस क्षण यह धीमा होता है, यह एक शून्य का सामना करता है। और यह उपस्थिति ऐसी स्थिति नहीं है जिसे मन समझ सके, क्योंकि यह विचार से परे मौजूद है।
जे. कृष्णमूर्ति ने एक भिन्न दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने बताया कि मन विश्वासों से आसक्त रहता है- इसलिए नहीं कि वे सत्य हैं, बल्कि इसलिए कि वे सुरक्षा की भावना प्रदान करते हैं। जिस क्षण हम स्वयं की मनगढ़ंत या समाज से दी गयी पहचान को छोड़ देते हैं- जैसे हमारा नाम, हमारा पद, हमारा काम, हमारी भूमिकाएं, हमारी उपलब्धियां, हमारे संघर्ष- उसी क्षण से मन खोया हुआ महसूस करता है। अब इसके पास कोई संदर्भ बिंदु ही नहीं है। फिर अब ये कैसे प्रवाहित होगा? फिर बचेगी तो मात्र एक मौन जागरूकता, नाम और रूप से अछूती। सोच-विचार करने वाले मन से परे एक उपस्थिति।
जिस क्षण हम वास्तविकता पर सवाल उठाना शुरू करते हैं, हम द्रव्य के गहन ज्ञान में कदम रखते हैं
लेकिन, इसे अपनाने के बजाय, मन प्रतिरोध करता है। यह स्वयं को और विचलित करता है। यह हल करने के लिए समस्याएं, इच्छाएं, यादों को फिर से जीने के लिए कुछ भी बनाता है- भीतर की ओर देखने से बचने के लिए कुछ भी करने का प्रयास करता है। यही कारण है कि, आज की दुनिया में, हम पहले से कहीं ज़्यादा बेचैन हैं। हम हर खाली जगह को शोर से भर देते हैं- सोशल मीडिया, मनोरंजन, अंतहीन उत्पादकता। क्योंकि एक खाली पल हमें किसी ऐसी चीज़ का सामना करने के लिए मजबूर करता है जिसे हम नहीं समझते हैं। उस पल में, खोज समाप्त हो जाती है। इसलिए नहीं कि हमें कोई उत्तर मिल गया है, बल्कि इसलिए कि हमें एहसास होता है कि शुरू में कोई सवाल ही नहीं था। फिर विचारों का तूफ़ान शांत होने लगता है। और जो शांत आकाश बचता है, उसमें हम स्वयं को नहीं, बल्कि उसकी अनुपस्थिति को देखते हैं। और यहीं से सच्ची मुक्ति शुरू होती है।
आत्म विचार मंत्रों का जाप करने के बारे में नहीं है। यह पहचानने के बारे में है कि हम स्वयं से कैसे बचते हैं। जब भी हम बोरियत से अपने ‘फ़ोन चेक’ करते हैं, अनावश्यक बहस में उलझे रहते हैं या मनोरंजन में डूब जाते हैं, तो मन का अलग ही खेल चल रहा होता है। किन्तु सत्य तो यह है कि मूल्यांकन किए बिना अवलोकन करने की क्षमता बुद्धिमत्ता का सर्वोच्च रूप है।
लेकिन, यहां विरोधाभास है- इस अन्वेषण से बचने से मुक्ति नहीं मिलती; यह पीड़ा को और गहरा करता है। जितना हम स्वयं से भागते हैं, उतना ही जीवन हमें पीछे धकेलता है। रिश्ते, करियर और परिस्थितियां हमारे अनसुलझे भ्रम को दर्शाने वाले दर्पण बन जाते हैं। बाहरी दुनिया कभी भी वह शांति नहीं देगी, जिसकी हम तलाश करते हैं, क्योंकि साधक ही बेचैनी का स्रोत है। तो, जब हम भागना बंद कर देते हैं, तो क्या होता है? जब हम खुद के साथ दो क्षण के लिए बैठते हैं, बिना किसी विचार के, बिना किसी पलायन के? पहली भावना जिसका हम सामना करते हैं, वह है बेचैनी। हिलने-डुलने, सोचने, ध्यान भटकाने की इच्छा। लेकिन अगर हम स्थिर रहें, तो कुछ बदल जाता है। शोर शांत होने लगता है, और एक जागरूकता उभरती है- एक विचार के रूप में नहीं, बल्कि एक उपस्थिति के रूप में। यह उपस्थिति व्यक्तिगत नहीं है। यह “मेरी जागरूकता” या “मेरी चेतना” नहीं है। यह केवल जागरूकता ही है, जो विचारों, पहचानों या भावनाओं से अछूती है। जिस क्षण हम यह देखते हैं, मन अपनी पकड़ खो देता है। खोज समाप्त हो जाती है। इसलिए नहीं कि हमें उत्तर मिल गया है, बल्कि इसलिए कि हम देखते हैं कि खोजकर्ता शुरू से ही वास्तविक नहीं था।
जिसने लय को स्पर्श कर लिया, वह संसार में शांति के साथ अग्रसर होता है, उसे कुछ परेशान नहीं करता
इस अहसास से मेल खाने वाली एक आकर्षक मनोवैज्ञानिक अवधारणा है संज्ञानात्मक संलयन यानि कोगनिटिव फ्यूज़न - स्वीकृति और प्रतिबद्धता चिकित्सा (ACT – Acceptance and Committment Theory) से लिया गया एक शब्द। यह तब होता है जब हम अपने विचारों और आत्म-कथाओं में इतने उलझ जाते हैं कि हम उन्हें वास्तविकता समझने की भूल कर बैठते हैं। विचारों को क्षणिक मानसिक घटनाओं के रूप में देखने के बजाय, हम उन्हें पूरी तरह से पहचान लेते हैं, जिससे एक अलग स्वयं के भ्रम को बल मिलता है। अत्यधिक संज्ञानात्मक संलयन चिंता, अवसाद और भावनात्मक कठोरता से जुड़ा हुआ है। जब हम विचारों को छोड़ देते हैं, तो हम इस चक्र को तोड़ देते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी उत्तर मन की रचनाएं हैं। इसका अर्थ यह है कि मन अब हमें नियंत्रित नहीं करता क्योंकि हम कभी मन थे ही नहीं। तब हम मन को समझते हैं, और विजयी अनुभव करते हैं। और हम समझ पाते हैं कि वह मौन ही हम हैं- और हम ही जीत हैं।
(लेखिका आईआईएम इंदौर में सीनियर मैनेजर, कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन एवं मीडिया रिलेशन पर सेवाएं दे रही हैं।)