इंदौर समेत देशभर के महाराष्ट्रीयन परिवारों में गौरी पूजन का तीन दिवसीय धार्मिक आयोजन शुरू हुआ। भाद्रपद मास में शुद्ध पक्ष में अनुराधा नक्षत्र पर महालक्ष्मी के स्वरूप में महाराष्ट्रीयन परिवारों में पीतल, मिट्टी के मुखौटे, कागज पर चित्र बनाकर या फिर जलाशय से पांच, सात, ग्यारह कंकर लाकर उन्हें गौरी पूजन के लिए घर में स्थापित किया जाता है।
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महालक्ष्मी ने दानवों से देवताओं की स्त्रियों की रक्षा की थी, इसलिए महाराष्ट्रीयन परिवारों में उनकी पूजा की जाती है। विघ्नहर्ता गणेश जी की स्थापना के तीसरे दिन महाराष्ट्रीयन परिवारों में उनकी ब्याहता बेटियों को पीहर में बुलाकर महालक्ष्मी की शरण में सदैव उनकी बेटियां प्रसन्न, सुरक्षित, सुहागन रहें, इस कामना के साथ महालक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है। महाराष्ट्रीयन परिवारों में अलग-अलग परंपरा के अनुसार पूजा की जाती है। कुछ परिवारों में ज्येष्ठा-कनिष्ठा बहनों के रूप में गौरी के मुखौटों की पूजा की जाती है, तो कुछ परिवारों में एकल मुखौटे के रूप में पूजा की जाती है। वास्तव में महालक्ष्मी गणेश जी की माता पार्वती का दूसरा नाम है।
पहले दिन ज्येष्ठा-कनिष्ठा के मुखौटों के साथ बाल गोपाल का मुखौटा भी घर आंगन के हर द्वार पर रखकर सुहागिनियों के साथ घर के सदस्यों के द्वारा पूजा की जाती है। दूसरे दिन महाआरती से पूर्व इन्हें विशेषरूप से शृंगारित करके पूरण की रोटी, कढ़ी, भजिए के साथ सोलह प्रकार से बनाई गई सब्जियां-चटनियों का भोग तैयार किया जाता है। तीसरे दिन सायंकाल को विसर्जन किया जाता है।