मन एव मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षयोः।
अर्थात, भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में मन को मनुष्य कि मुक्ति और बंधन का मूल कारण माना गया है। विश्व के किसी भी अन्य देश के इतिहास का अवलोकन करने पर ऐसी कोई घटना प्राप्त नहीं होगी जब दो सेनाएं आमने-सामने हों और एक सेना का महारथी, जिसके कंधों पर विजय का और प्रकांड योद्धाओं को पराजित करने का दारोमदार हो, वही युद्ध के क्षणभर पूर्व यह घोषणा कर दे कि विपक्ष में मेरे अपने हैं। मैं कदाचित इनपर शस्त्र नहीं उठा सकता। मैं यह युद्ध नहीं लड़ सकता। वह व्याकुल हो कर रथ के पिछले भाग में जा कर बैठ जाए। सोचिए, कितना दुर्लभ है इतनी विषम परिस्थिति में भी पूर्ण धैर्य और मुख पर मुस्कान के साथ में उस योद्धा को चमत्कारी तरीके से मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण देना, उसकी मानसिकता को समझना, और अंत में उस योद्धा के मुख से यही उच्चारण होना...
‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
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स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव’।।
कि मेरा मोह नष्ट हो चुका है और अब आप जो कहेंगे, वह करने के लिए मैं तैयार हूं। अध्यात्म से पूर्ण यह मनोविज्ञान जो चुनौतीपूर्ण समय में व्यक्ति को समाहित कर रहे नकारात्मक और भ्रमित करने वाले दूषित विचारों का दोहन कर दे, श्रीमद्भागवद्गीता के भीष्म पर्व में प्राप्त होता है। अक्सर हम ऐसी परिस्थिति का सामना करते हैं जब हमारा मन और मस्तिष्क अपना मूल खो देते है और उसका चित्रण हमारे मस्तक पर उभरी रेखाओं में प्रदर्शित होने लगता है। हमारे रोम-रोम में कम्पन होता है और हमारे हाथ कांपते हैं। ऐसी स्थिति में भी बिना विचलित हुए अपने लक्ष्य, विचार, धर्म और उद्देश्य के प्रति स्पष्ट रहना एक उत्तम प्रबंधक का संकेत है। सिर्फ कार्य का प्रबंधक ही नहीं, अपितु उत्कृष्ट जीवन और आध्यात्म का प्रबंधक भी। गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा कहे गए लगभग 600 श्लोकों में अधिकांश व्यक्ति कि मनोदशा का विश्लेषण करने में और कठिनतम मार्गदर्शन देने में सक्षम हैं। आज भी इन सभी श्लोकों को प्रासंगिक माना जाता है और इनसे प्रबंधन के नवीन प्रारूप निर्मित किए जाते हैं। इस प्रकार, एक व्यक्ति जब भीषणता में भी अपना धैर्य बनाए रखे – इस स्थिति को मनोवैज्ञानिकता से पूर्ण गीता में ‘स्थिर प्रज्ञ’ कि अवस्था कहा गया है।
क्या है ये स्थिर प्रज्ञ? कल्पना कीजिए कि आप सागर किनारे हैं। लहरें उठ रही हैं। दूर तक भू-भाग नहीं है। तूफान कीसंभावना भी है। लेकिन, आपके भीतर एक शांत भाव है, एक स्थिरता जो बाहरी अराजकता से अप्रभावित है। आप उन लहरों को आते-जाते देख रहे हैं। उनकी आवाज सुन रहे हैं। यह स्थिर प्रज्ञ का सार है– अविचलित, दृढ, मधुर, साहसिक किन्तु स्थिर मन। सत्य तो यह है कि यह मात्र एक उच्च आध्यात्मिक अवधारणा नहीं है, बल्कि मानव प्रकृति की एक एकीकृत समझ है जो आध्यात्मिक ज्ञान को मनोवैज्ञानिक परिदृश्य और वैज्ञानिक प्रमाणों से जोड़ती है। स्थिर प्रज्ञ का विचार आध्यात्मिकता से प्रारंभ होता है, लेकिकन इसकी प्रासंगिकता हमारे अस्तित्व के हर अणु में समाहित है। यह वही है जो हमें सच्चा ज्ञान प्राप्त करने में मदद करती है। यह वही है जो हमारे मन को बाहरी परिवर्तनों, सुख या दुःख, सफलता या असफलता से विचलित नहीं होने देती। आध्यात्मिक रूप से, इसका अर्थ है जीवन के सतही उतार-चढ़ाव से परे उच्च स्व या आत्म में निहित होना। हालांकि, परिणामों से अलगाव की यह भावना जीवन की चुनौतियों से बचने के बारे में नहीं है, अपितु उनके बावजूद एक शांत आंतरिक स्थान में स्वयं का आधार सुदृढ़ बनाए रखने के बारे में है। यह संतुलन ही है जो आपको भावनात्मक अशांति से मुक्त करता है और इसका हमपर मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ता है।विज्ञापन
स्थिर प्रज्ञ की अवधारणा मनोविज्ञान द्वारा ‘भावनात्मक विनियमन’ तत्व को दर्शाती है–अर्थात भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को प्रबंधित करने की हमारी क्षमता। जो लोग अपनी भावनाओं में स्थिर होते हैं, वे तनाव को नियंत्रित करने, निर्णय लेने और जटिल परिस्थितियों से बिना अभिभूत हुए समाधान खोज लेने का कौशल रखते हैं। भावनात्मक बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में हुए शोध से ज्ञात होता है कि जो व्यक्ति इस कौशल में निपुण होते हैं, वे न केवल जीवन में सफल होते हैं बल्कि समग्र रूप से बेहतर स्वास्थ्य का भी अनुभव करते हैं। अर्थात, वे प्रतिकूल परिस्थितियों से उबरने की क्षमता रखते हैं, जो वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध किया जा चुका है।
आधुनिक तंत्रिका विज्ञान ने प्राचीन ग्रंथों से ज्ञान लेते हुए मानचित्रण आरम्भ कर दिया है। ध्यान और स्थिर प्रज्ञ की स्थिति की ओर ले जाने वाले अभ्यास, जो सचमुच मस्तिष्क को नया आकार देते हैं। ये अभ्यास 'डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क' (DMN) में गतिविधि को कम करता है, जो मन-भटकने और आत्म-संदर्भित विचारों के लिए जिम्मेदार है। अनिवार्य रूप से यह वह मानसिक शोर है जो हमें शांत रहने से विचलित करता है। इस शोर को शांत करने से मस्तिष्क अधिक कुशलता से कार्य करने में सक्षम होता है, स्पष्टता, भावनात्मक नियंत्रण में वृद्धि करता है। दीर्घकालिक अभ्यासियों में, ध्यान निर्णय लेने कि क्षमता में भी विस्तार करता है। अतः स्थिर प्रज्ञ की आध्यात्मिक अवधारणा न केवल भावनात्मक बुद्धिमत्ता के माध्यम से मनोविज्ञान में मान्य है, बल्कि मस्तिष्क कैसे काम करता है, इस पर वैज्ञानिक निष्कर्षों द्वारा भी समर्थित है। आपस में संबंधित ये क्षेत्र आध्यात्म- मनोविज्ञान और विज्ञान हमें बताते हैं कि आंतरिक शांति मात्र एक आध्यात्मिक खोज नहीं है, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक आवश्यकता और एक वैज्ञानिक वास्तविकता है। निरंतर अभ्यास से हम न केवल उच्च स्व के संपर्क आते हैं, अपितु जीवन के तूफानों का सामना करते हुए शांत मन, स्पष्ट दृष्टि और अनुकुलनशीलता से पूर्ण रहते हैं।यह तथ्य एक सार्वभौमिक सत्य की ओर संकेत देता है: हमारे मन को स्थिर करने की शक्ति हमारे भीतर है, जिसकी वृद्धि और विकास हमपर निर्भर है। फिर, चाहे हम इसे आध्यात्म कहें, मनोविज्ञान या सिर्फ विज्ञान। यह ब्रह्म है और यह समस्त में, सर्वत्र, सर्विदित है।
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(लेखक आईआईएम इंदौर में सीनियर मैनेजर, कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन एवं मीडिया रिलेशन पर सेवाएं दे रही हैं।)