सरकार भले ही सरकारी अस्पतालों में लाख बेहतर सुविधाएं देने के दावे करे, लेकिन हकीकत में लोग परेशान रहते है। एक महिला को अपने बेट से मृत बच्चे को आपरेशन से निकलवाने के लिए १३ घंटे तक इंतजार करना पड़ा। सरकारी डाक्टर 'बाद में आना' की मानसिकता के साथ पेश आते रहे। आखिरकार महिला के पति ने कलेक्टर को फोन लगाया। उनके हस्तक्षेप के बाद आपरेशन हो सका।
नंदानगर में रहने वाले गंगराम शर्मा अपनी पत्नी प्रियंका के साथ २७ मार्च को पीसी सेठी अस्पताल गए थे। डाक्टरों ने सोनोग्राफी करने के लिए कहा था। सोनोग्राफी सेंटर के कर्मचारियों ने ११ अप्रैल को आने के लिए कहा था। तय समय पर दंपत्ति सोनोग्राफी के लिए पहुंचे तो पता चला कि पेट में पल रहे शिशु की मौत हो चुकी है। रिपोर्ट लेकर दंपत्ति पीसी सेठी अस्पताल पहुंचे और डाक्टरों से आपरेशन कर बच्चा निकालने का आग्रह करते रहे,लेकिन डाक्टरों ने टाल दिया। दंपत्ति हैरान परेशान हो गए और जब डाक्टरों ने आपरेशन से इनकार कर दिया तो उन्होंने कलेक्टर इलैया राजा को फोन लगाया।
फिर कलेक्टर ने डाक्टरों को फोन कर आपरेशन के लिए कहा। इसके बाद आपरेशन हुआ और मृत बच्चे को पेट से निकालकर पोस्टमार्टम के लिए एमवाय अस्पताल भेजा गया। अब इस मामले में जांच भी हो रही है कि आखिर क्या आधार बनाकर डाक्टर दंपत्ति को आपरेशन से इनकार करते रहे।
इस मामले मेें पीसी सेठी अस्पताल के डाॅ. निखिल अोझा का कहना है कि दंपति्त को दोपहर में हमने बच्चे के मृत होने की जानकारी दी थी गंगराम शर्मा यह कहते हुए अस्पताल से चले गए कि उनकों डाक्टरों की बात पर विश्वास नहीं है। निजी अस्पताल मेें जांच कराएंगे। शाम को वे निजी अस्पताल की रिपोर्ट लेकर फिर अस्पताल आए और नाराज होने लगे। बाद में उनका आपरेशन किया। बच्चे को पोस्टमार्टम भी कराया गया, ताकि यह पता चल सके कि कितने समय पहले बच्चे की मौत गर्भ में हुई।