डीआरपी लाइन में अधिकतर लोग अपार्टमेंट में रहते हैं, जहां दूसरी और तीसरी मंजिल पर रहने वालों को सबसे ज्यादा दिक्कत होती है। बारिश और सर्दियों में पानी आसानी से टंकियों तक पहुंच जाता है, लेकिन गर्मियों में टैंकर ही एकमात्र सहारा बन जाते हैं। पहले ड्रमों में पानी भरना और फिर मोटर से उसे टंकी तक चढ़ाना—यह रोज की मशक्कत बन गई है, जिसमें परिवार के किसी सदस्य का करीब आधा घंटा रोज खर्च होता है। सिपाही नरेश सोनी बताते हैं कि ड्यूटी पर जाने से पहले ही पानी की चिंता सताने लगती है। नलों में मुश्किल से 10 मिनट पानी आता है, जिससे पर्याप्त भंडारण नहीं हो पाता।
वहीं निवासी श्रीकुवंर का कहना है कि पिछले दो दिनों से नलों में पानी नहीं आया है। बोरिंग की वायरिंग जल जाने से स्थिति और खराब हो गई है। टैंकर बुलाने के लिए बार-बार फोन करना पड़ता है, लेकिन पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता। मजबूरी में पानी का बहुत सावधानी से उपयोग करना पड़ रहा है, यहां तक कि कपड़े धोने तक सीमित करने पड़ रहे हैं।
सोहरम पटेल बताते हैं कि उनके दोनों बेटे पुलिस सेवा में हैं और सुबह जल्दी ड्यूटी पर चले जाते हैं, जिससे घर पर पानी की समस्या और बढ़ जाती है। डीआरपी लाइन में मैदान, मंदिर और गार्डन जैसी सुविधाएं तो हैं, लेकिन पानी की समस्या बेहद गंभीर बनी हुई है। मई के महीने में हालात और खराब हो जाते हैं। नल दो-तीन दिन में एक बार ही आते हैं और टैंकरों के भरोसे ही गुजारा करना पड़ रहा है।