इंदौर में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) अब टेप्टाइड प्रोटीन से दवाई बनाने पर ध्यान दे रहा है। अब तक संस्थान वैक्सीन बनाने का काम कर रहा था, लेकिन ओमिक्रॉन वैरिएंट आने के बाद अब संस्थान दवाई बनाने पर फोकस कर रहा है। इसके लिए वैक्सीन का काम रोककर दवा बनाने के काम को गति दे दी है।
आईआईटी ने यूनाइटेड नेशन और यूनेस्को के साथ मिलकर परिसर में काम शुरू किया है। देश का यह पहला आईआईटी है जहां कोरोना के अलावा चिकनगुनिया, डेंगू जैसे संक्रमणों के निदान के लिए शोध कार्य और संक्रमण को दूर करने के उपाय तलाशे जाएंगे। संस्थान का दावा है कि इसी के तहत कोरोना संक्रमण का इलाज और बचाव के लिए हमारी दवाई कारगर साबित हो सकती है।
इसके पहले आईआईटी इंदौर कोरोना संक्रमण फैलने और संक्रमण के मस्तिष्क पर असर को लेकर भी नतीजे दे चुका है। संस्थान के प्रोफेसर्स ने दावा किया था कि संक्रमण में मौजूद प्रोटीन में बदलाव से उसका स्वरूप बदलता है। प्रोटीन का जुड़ाव और बंधन बदलने से संक्रमण का प्रकोप और प्रभाव भी बदल रहा है। संस्थान के बायोसाइंसेस इंजीनियरिंग के प्रो. हेमचंद्र झा ने भी दावा किया था कि कोरोना संक्रमण के इलाज के लिए वैक्सीन से ज्यादा दवाई कारगर हो सकती है। संस्थान तापमान नियंत्रण, रिमोर्ट तापमान निगरानी और स्थान ट्रैकिंग प्रणाली बनाने के साथ ही पोर्टेबल स्टैंडअलोन वैक्सीन बॉक्स भी बना चुका है।
प्रोटीन आधारित दवाई बनाने का उद्देश्य
आईआईटी के कार्यवाहक निदेशक प्रो. नीलेश कुमार जैन ने बताया कि हम शुरुआत से कोरोना संक्रमण पर काम कर रहे हैं। कोरोना की पहली लहर में अल्फा और फिर दूसरी लहर में डेल्टा वैरिएंट को देखते हुए वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया को बदलना पड़ा था। अब ओमिक्रॉन वैरिएंट आ गया है तो हमारा उद्देश्य है कि जल्द ही इसके इलाज के लिए प्रोटीन आधारित दवाई बनाने का है। नीदरलैंड और जापान के शोधकर्ताओं के साथ हमारे बायोसाइंसेस और बायोमेडिकल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मिर्जा एस बेग ने दवाई बनाने में टेप्टाइड प्रोटीन को कारगर बताया है। शोध के बाद इससे दवाई बनाने के पहले किए जाने वाले प्रयोग इस समय लैब में किए जा रहे हैं और उम्मीद है कि दो महीने में लैब से संबंधित काम होने के बाद आईसीएमआर और अन्य संस्थानों को इसकी जानकारी देकर दवाई बनाने की अनुमति ली जाए। इस कार्य में छह महीने तक का समय लग सकता है।