दुष्कर्म के एक मामले में हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को निरस्त दिया। निचली अदालत ने आरोपी को दस साल की सजा सुनाई थी और जेल भेज दिया था। हाईकोर्ट में अपील की तो मामले में नया एंगल सामने आया। फरियादी ने खुद को नाबालिग बताया था मगर इसके प्रमाण नहीं दे सकी। इसके बाद फैसले को बदला। सात साल जेल में बिताने के बाद युवक बेकसूर साबित हुआ।
एडवोकेट मनीष यादव ने बताया कि 25 दिसंबर 2014 को देवास पुलिस थाने में पीड़िता के पिता ने रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। इसमें बताया था कि समीर ने बेटी का अपहरण कर दुष्कर्म किया था। समीर को उसी दिन गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया। अगले दिन जेल भेज दिया। तब समीर की उम्र 22 वर्ष थी। करीब तीन साल ट्रायल चलने के बाद जिला न्यायालय देवास ने अपहरण और दुष्कर्म सहित अन्य धाराओं में समीर को 10 साल की सजा सुनाई। 32 हजार रुपये का अर्थदंड दिया। इस सजा के विरोध में 2018 में हाईकोर्ट में अपील की गई, जिसके फैसले में निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को निरस्त किया गया। इस मामले में महत्वपूर्ण तथ्य ये रहे कि पीड़िता ने धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए बयान में नहीं कहा कि उसका अपहरण और दुष्कर्म किया गया। घटना के वक्त पीड़िता की उम्र 15 वर्ष बताई गई लेकिन यह कोर्ट में साबित नहीं हो सका। उम्र संबंधी दस्तावेज पेश नहीं किया गया। बचाव पक्ष के तर्क थे कि समीर और पीड़िता के बीच प्रेम संबंध थे और इसी वजह से दोनों चले गए थे और दस दिन साथ रहे। पीड़िता की उम्र की पुष्टि के लिए उसके स्कूल के प्राध्यापक को भी बुलाया गया, लेकिन उन्होंने जानकारी नहीं होने की बात कही।
नाबालिग होने का बिंदू कोर्ट में साबित नहीं हो सका
इस मामले में जस्टिस सत्येंद्र सिंह की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए फैसला दिया कि आरोपी की न केवल सजा निरस्त की जाती है, बल्कि उसके द्वारा चुकाया गया जुर्माना भी वापस किया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि निचली अदालत ने तथ्यों का अध्ययन करने में गंभीर गलती की है। इसकी वजह से बेकसूर व्यक्ति को सात साल तक जेल में रहना पड़ा। निचली कोर्ट के फैसले को खारिज किया जाता है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी भी की कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेश के अनुसार जहां पीड़िता की आयु में संदेह है, वहां अभियोजन की जिम्मेदारी होती है कि वह उसे साबित करे। इस केस में तथ्यों के बावजूद निचली अदालत ने सजा देने में गंभीर त्रुटि की है। तथ्यों के अध्ययन में गलती की वजह से निर्दोष युवक को जीवन के 7 वर्ष जेल में बिताने पड़े। इधर इस मामले में घटना के वक्त पीड़िता के नाबालिग होने का बिंदू कोर्ट में साबित नहीं हो सका। इसके बाद अक्टूबर 2017 में देवास जिला न्यायालय के फैसले को इंदौर हाई कोर्ट में जस्टिस सत्येंद्र कुमार सिंह की एकल पीठ ने खारिज कर दिया है। निचली अदालत द्वारा लगाए गए अर्थदंड भी लौटाने का आदेश दिया।