इंदौर पांच साल से स्वच्छता में देश में नंबर एक है। उसकी सक्सेस स्टोरी एक मैनेजमेंट प्रोग्राम की शक्ल ले रही है। इंदौर आईआईएम इस पर काम कर रहा है और जल्द ही उसके सहयोग से कानपुर और अयोध्या जैसे शहर भी स्वच्छता की डगर पर आगे बढ़ेंगे।
इंदौर पिछले पांच साल से स्वच्छता में लगातार देश में अव्वल है। इंदौर का कचरे को अलग-अलग करने का मॉडल पूरी दुनिया में पसंद किया जा रहा है। आईआईएम इंदौर भी स्वच्छता के इस मिशन में शामिल है और वह देश के अन्य शहरों को स्वच्छ बनाने की मुहिम पर निकल पड़ा है।
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आईआईएम इंदौर के डायरेक्टर डॉ. हिमांशु राय ने कहा कि इंदौर नगर निगम के साथ मिलकर सर्टिफिकेट और डिप्लोमा कोर्सेस पर काम कर रहे हैं। अभी यह प्रारंभिक स्टेज पर है। जल्द ही हम इस पर कोर्सेस और प्रोग्राम शुरू कर देंगे। आईआईएम इंदौर ने अयोध्या नगर निगम को स्वच्छ करने का प्लान बनाकर दिया है। उस पर क्रियान्वयन शुरू होने वाला है। कानपुर नगर निगम ने भी इंदौर आईआईएम के साथ एमओयू किया है और उसकी रिपोर्ट पर भी काम चल रहा है। प्रस्तुत हैं डॉ. हिमांशु राय से बातचीत के प्रमुख अंश-
इंदौर नगर निगम के साथ आईआईएम इंदौर जो प्रोग्राम बना रहा है, वह क्या है? यह किसके लिए होगा?
डॉ. हिमांशु राय: हम इंदौर नगर निगम के साथ मिलकर पब्लिक पॉलिसी और पब्लिक सिस्टम्स पर कुछ सर्टिफिकेट प्रोग्राम और कुछ डिप्लोमा प्रोग्राम बनाएंगे। इस पर काम चल रहा है। इस प्रोग्राम में कोई भी भाग ले सकता है। सरकार भी इसमें किसी को मनोनीत कर सकती है। इसमें पार्षद, अधिकारी या कंसल्टेंसी में काम करने वाले लोग आ सकते हैं। इसमें जो प्रैक्टिकल एलिमेंट होगा, वह इंदौर नगर निगम के साथ करेंगे।
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क्या आईआईएम इंदौर किसी और शहर के लिए भी काम कर रहा है?
डॉ. हिमांशु राय: हां। हमने अयोध्या को IEC (इंफॉर्मेशन, एजुकेशन और कम्युनिकेशन) स्ट्रैटजी बनाकर दी है। हमने अयोध्या के हर वार्ड और मोहल्ले में जाकर स्टडी की है। यह जाना कि शहर को स्वच्छ बनाने में किस तरह के व्यवधान आ रहे हैं। कहां कैसे लोग रहते हैं? उन्हें भावनात्मक तौर पर स्वच्छता से कैसे जोड़ा जा सकता है? ऐसा नहीं है कि एक ही पोस्टर बनाकर आप पूरे शहर में लगा दो तो उसका प्रभाव पड़ जाएगा। हम यह देखते हैं कि किस इलाके में कितने पढ़े-लिखे लोग हैं, उनकी क्या अपेक्षाएं हैं, पोस्टर अच्छा रहेगा या ऑडियो विजुअल कैम्पेन की जरूरत पड़ेगी। अगर पोस्टर अच्छा रहेगा तो उसमें किन शब्दों का इस्तेमाल होना चाहिए? हर व्यक्ति अलग तरह के शब्दों के साथ भावनात्मक जुड़ाव महसूस करता है। हमने अयोध्या को रिपोर्ट दे दी है। कानपुर की रिपोर्ट बना रहे हैं।
IIM Indore का कैम्पस।
- फोटो : अमर उजाला
इंदौर नगर निगम के साथ आईआईएम इंदौर का क्या रिश्ता है?
डॉ. हिमांशु राय: हम कई स्तर पर मिलकर काम कर रहे हैं। पब्लिक पॉलिसी या पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन से जुड़े लोग आते हैं तो हम उन्हें इंदौर नगर निगम के काम दिखाने ले जाते हैं। नगर निगम को अनौपचारिक सुझाव भी देते रहते हैं। हमने ट्रैफिक मैनेजमेंट को लेकर इंदौर नगर निगम के साथ एमओयू किया है। हम इसी मॉडल को अन्य शहरों में भी लागू करेंगे। कोविड की वजह से इसे पूरी तरह लागू नहीं कर सके। फिर भी एक सड़क को मॉडल रोड बनाया है। उस पर कुछ प्रयोग किए हैं। उसे अब अन्य जगहों पर लागू करेंगे। अभी हम केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के साथ भी काम कर रहे हैं। इंदौर नगर निगम समेत अन्य संस्थाओं के अधिकारियों की कैपेसिटी बिल्डिंग भी इसका हिस्सा है। हम चाहते हैं कि इंदौर में वेस्ट सेग्रिगेशन (कचरे के पृथक्करण) के मॉडल को अन्य शहरों में भी दोहराया जाए। इसमें हमारा काम मैनेजमेंट का होगा। वेस्ट मैनेजमेंट कैसे हो रहा है, यह इंदौर नगर निगम बताएगा।
क्या आप किसी भी शहर के ट्रैफिक मैनेजमेंट को सुधार सकते हैं?
डॉ. हिमांशु राय: हमने ट्रैफिक मैनेजमेंट की स्टडी का बेसिक मॉडल बना लिया है। हमारी फेकल्टी की टीम अब इसमें एक्सपर्ट है। गूगल सैटेलाइट की इमेज से एक महीने का डाटा लेकर स्टडी करते हैं। उसके आधार पर सुझाव देते हैं। हमने एक 5E (एजुकेशन, इंजीनियरिंग, इनफोर्समेंट, इनवायरनमेंट और इमरजेंसी) मॉडल बनाया है। इससे ट्रैफिक मैनेजमेंट सुधार सकते हैं। एजुकेशन यानी स्कूल में बच्चों को यातायात के नियमों की जानकारी, पोस्टर लगाना और इसी तरह के काम आते हैं। एनफोर्समेंट में रेगुलेशन से जुड़े विषय है। कितना जुर्माना लगाना है। नियमों में किस तरह के बदलाव होने चाहिए। हम इससे जुड़े सुझाव देते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में आईआईएम इंदौर ने सरकारों और सरकारी संस्थाओं के साथ मिलकर कई प्रोजेक्ट किए हैं? क्या यह कोई पॉलिसी में बदलाव है?
डॉ. हिमांशु राय: दरअसल, जिस दिन मैं डायरेक्टर बना, उसी दिन कहा था कि आईआईएम राष्ट्र निर्माण के लिए जो कर सकता था, वह हमने नहीं किया है। अपॉर्चुनिटी मिली है तो मैं यह कर रहा हूं। यह गतिविधियां स्टूडेंट्स के लिए भी लाभदायक है। उनमें सरकार के मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता आती है। लाइव प्रोजेक्ट मिलते हैं। पर्सपेक्टिव मिलता है कि अन्य जगहों पर काम कैसे हो रहा है? ज्यादातर स्टूडेंट्स कॉर्पोरेट लाइफ में जाते हैं। कुछ आंत्रप्रेन्योर बनते हैं। कुछ सिविल सर्विसेस में जाते हैं। कुछ सोशल सेक्टर में जाते हैं। बहुत सारे लोगों को लगता है कि सरकार में कोई काम नहीं होता है। जब वे सरकार के साथ मिलकर काम करते हैं तो उन्हें समझ आता है कि किस तरह की चुनौतियां हैं। सरकार के काम के प्रति उनकी संवेदनशीलता बढ़ती है। आईआईएम इंदौर में मेरा यह मानना है कि हम राष्ट्रनिर्माण में भागीदार बनें। जो भी आना चाहता है, हम उसके साथ मिलकर काम करेंगे। आप हमें समस्याएं दो, हम समाधान निकालने का प्रयास करेंगे।
क्या आईआईएम इंदौर केंद्र सरकार के साथ भी काम कर रहा है? अगर हां, तो किस प्रोजेक्ट पर?
डॉ. हिमांशु राय: हम केंद्र सरकार के साथ कई प्रोजेक्ट कर रहे हैं। कंसल्टेंसी प्रोग्राम में इंदौर आईआईएम एक्सपर्ट है। एक प्रोजेक्ट है- IVA यानी इंडिपेंडेंट वेरिफिकेशन एजेंसी। सरकार की संकल्प, स्ट्राइव और स्टार्स योजनाओं का हम स्वतंत्र सत्यापन कर रहे हैं। मिसाल के तौर पर DLI (डिस्ट्रिक्ट लेवल इंडिकेटर) से हम बताते हैं कि किसी योजना के उद्देश्य को पूरा कर पाए या नहीं। नहीं कर पाए हैं तो क्यों नहीं कर पाए और क्या करना चाहिए था। हम सरकार का ऑडिट कर रहे हैं। यह एक बड़ा काम है।
आगे किस तरह के प्रोजेक्ट पर इंदौर आईआईएम काम कर रहा है?
डॉ. हिमांशु राय: अब इंदौर आईआईएम हेल्थ सेक्टर में भी आगे बढ़ रहा है। कोवीशील्ड वैक्सीन बनाने वाली एस्ट्राजेनेका और जर्मन कंपनी GIZ से फंडिंग मिली है। GIZ से मिली फंडिंग से कोविड के अलग-अलग सेक्टर पर पड़े प्रभावों का अध्ययन किया जा रहा है। हम जल्द ही इस पर एक रिपोर्ट बनाकर सरकार को सौंपने वाले हैं। एस्ट्राजेनेका की फंडिंग से हम फेफड़ों के कैंसर से होने वाले सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं। पत्थरदिल होकर यह बात नहीं कह रहा हूं, पर मरीज के साथ-साथ उसके परिवार पर भी भावनात्मक और आर्थिक तौर पर नेगेटिव प्रभाव पड़ता है। हम एक मॉडल बना रहे हैं, जिससे प्रभावों को जान सकें। इन प्रभावों को कैसे कम कर सकते हैं, इस पर सरकार को सुझाव देंगे।
आईआईएम इंदौर ने क्या कोई नया कोर्स ऑफर किया है?
डॉ. हिमांशु राय: हां। इंदौर में इतने साल से आईआईटी और आईआईएम थे, पर साथ में कुछ नहीं कर रहे थे। पहली बार मैंने दो साल पहले एमओयू कराया। इसी साल 21 मार्च को हमने एक जॉइंट डिग्री प्रोग्राम लॉन्च किया है। इसमें एडमिशन के लिए कैट का स्कोर चाहिए और उसके बाद इंटरव्यू होता है। मास्टर्स इन डाटा साइंस एंड मैनेजमेंट का यह प्रोग्राम देश में अनूठा है। यह दो साल का कोर्स है। 15-15 दिन के कैम्पस मॉड्यूल है। 15 दिन इंदौर आईआईटी के कैम्पस में और 15 दिन इंदौर आईआईएम के कैम्पस में।
लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन कोर्सेस का बूम आया था। क्या यह आगे भी जारी रहेगा?
डॉ. हिमांशु राय: हां। लॉकडाउन के दौरान हमारे सर्टिफिकेट कोर्सेस में लगभग तीन गुना वृद्धि हुई है। कोर्सेस की संख्या के साथ ही एनरोल होने वाले छात्रों का नंबर भी तीन गुना बढ़ा है। लोग घर पर थे तो उन्होंने ज्यादा से ज्यादा ऑनलाइन कोर्सेस करने की कोशिश की। हम इन प्रोग्राम्स को आगे भी जारी रखेंगे। प्रत्यक्ष कोर्सेस तो रहेंगे ही, ऑनलाइन कोर्सेस भी जारी रहेंगे। नॉलेज की बात आती है तो हम उसे ऑनलाइन मोड में दे सकते हैं, पर जब स्किल्स और एटीट्यूड की बात आती है तो वह ऑफलाइन में ही बेहतर तरीके से डिलीवर हो सकती है।