इंदौर और ग्वालियर के बीच विवाद की स्थिति थी मुख्य वजह...
इतिहासविद माता प्रसाद शुक्ला ने इस विषय पर प्रकाश डालते हुए बताया, जब मध्यभारत का गठन हुआ तो उस समय ग्वालियर को राजधानी बनाने को लेकर ग्वालियर-इंदौर के तत्कालीन राजपरिवारों के बीच कई बार विवाद की स्थिति बन जाती थी। ग्वालियर का राजपरिवार और उनके समयर्थक तो चाहते थे कि ग्वालियर को ही प्रदेश की राजधानी बनाया जाए। लेकिन यही स्थिति इंदौर में भी बनी हुई थी, जिसके चलते बीच का रास्ता निकाला गया, जिसमें यह निर्णय हुआ कि सात महीने तो ग्वालियर प्रदेश की राजधानी रहेगी और बाकी के पांच महीने इंदौर को राजधानी के सभी दायित्व संभालने का मौका दिया जाएगा।
यह व्यवस्था कुछ समय तक तो चली, लेकिन आए दिन विवाद बढ़ने लगा, जिसके चलते प्रदेश के विकास में भी परेशानी आने लगी। इसको लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने वल्लभ भाई पटेल को भेजा। वहीं डॉ. शंकर दयाल शर्मा जो कि उस समय वरिष्ठ राजनेताओ में थे। साथ ही प्रधानमंत्री के नजदीकी भी माने जाते थे। उन्होंने विचार दिया कि दोनों के मध्य में भोपाल है, इसे विकसित कर इसे ही राजधानी क्यों न बना दिया जाए, जो कि प्रधानमंत्री को सही भी लगा। इस तरह भोपाल को प्रदेश की राजधानी बनाया गया।
अन्य वजह भी बनी रोढ़ा...
ग्वालियर के राजधानी न बनने के बीच क्या अटकलें आईं, इस विषय पर वरिष्ठ जानकार देवश्री माली से बातचीत हुई तो उन्होंने बताया कि इंदौर-ग्वालियर के आपसी मतभेद तो वजह थे ही। इसके साथ ही कई अन्य वजहें भी थीं। उन्होंने बताया कि उस समय मध्यप्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य माना जाता था, जिसके चलते ग्वालियर की अन्य शहरों से दूरी भी बहुत अधिक थी, जिसके चलते ओवर नाइट लोग नहीं पहुंच पा रहे थे और उस समय इतने परिपक्व साधन भी नहीं हुआ करते थे। इसके अलावा उन दिनों जो लोग नहीं चाहते थे कि ग्वालियर राजधानी बने, उन्होंने एक विरोधभाषी चर्चाओं का बाजार गर्म कर रखा था कि ग्वालियर ही वो जगह है जहां से महात्मा गांधी की हत्या के आरोपी नाथूराम गोडसे ने बंदूक खरीदी और उसे चलाने की ट्रेनिंग भी ली थी। ऐसे स्थान को राजधानी कैसे बनाया जा सकता है। इसी तरह की चर्चाओं और कारणों के चलते ग्वालियर प्रदेश की राजधानी होने के गौरव से वंचित रह गया।