सोशल मीडिया पर एक वीडियो इन दिनों एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें कई किसान देशी अमरूदों को कूड़ा एकत्र करने वाली गाड़ी में फेंकते नजर आ रहे हैं। यह स्थिति कोरोना वायरस संकट के साथ इस बार देशी अमरूद की बंपर पैदावार और मंडियों में बेहद कम कीमत की वजह से बन गई है।
खेती और बाजार के जानकार कहते हैं कि ऐसी स्थिति कोविड-19 महामारी संकट के साथ देशी अमरूद की बंपर पैदावार की वजह से थोक मंडियों में इसकी कीमतों के नीचे जाने की वजह से बनी है। परिणामस्वरूप राज्य में देशी अमरूद की खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है।
सूत्रों ने रविवार को बताया कि इंदौर की देवी अहिल्याबाई होलकर फल-सब्जी मंडी में देशी अमरूद की कीमत बुरी तरह नीचे जा चुकी है। थोक बाजार में इन दिनों इस फल की खरीद चार रुपये से 10 रुपये प्रति किलोग्राम के बीच हो रही है। कई किसान को अपनी अमरूद की फसल मंडी में छोड़ जा रहे हैं।
मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के अमरूद उत्पादक किसान राजेश पटेल ने बताया कि मध्यप्रदेश के साथ ही छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और देश के अन्य राज्यों में देशी अमरूद की बंपर पैदावार इस फल की कीमतों में गिरावट की सबसे बड़ी वजह है। उन्होंने बताया कि कोविड-19 के प्रकोप के कारण दिल्ली की उन मंडियों में अमरूद का थोक कारोबार बुरी तरह प्रभावित हो रहा है जहां से समूचे उत्तर भारत में इस फल की आपूर्ति की जाती है।
करीब 22 एकड़ में अमरूद उगाने वाले पटेल ने बताया कि सबसे ज्यादा मुश्किल उन किसानों को हो रही है जिन्होंने अमरूद की देशी किस्में उगाई हैं। इन किस्मों के फल पेड़ से तोड़े जाने के तीन-चार दिन के भीतर ही पककर खराब हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि देशी अमरूद को इस फल की थाईलैंड मूल की उन संकर किस्मों से कड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है जिनका फल अपेक्षाकृत बड़ा तथा चमकदार होता है और जिसे ज्यादा वक्त तक सहेज कर रखा जा सकता है।
इस बीच, कृषक संगठन किसान सेना के सचिव जगदीश रावलिया ने खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को बढ़ावा देने के सरकारी दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि राज्य में अमरूद से रस और गूदा निकालने वाली इकाइयों का बड़ा अभाव है। उन्होंने कहा, अगर सूबे में पर्याप्त खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां होतीं, तो किसानों को अपनी अमरूद की उपज यूं ही फेंकने पर मजबूर नहीं होना पड़ता।