मध्य प्रदेश के दमोह जिले के हटा में पति-पत्नी के प्रेम की मिसाल पेश करता एक स्मारक है। एक कवि ने अपनी पत्नी की याद में पत्थर पर छैनी-हथौड़े से अपने दिल की बात लिख दी है। इतना ही नहीं, बाद में कवि और उनकी पत्नी के नाम से ही इस वार्ड का नाम 'रमा कवि वार्ड' रखा गया। हटा नगर पालिका के 15 वार्डों में से एक इस वार्ड की अनोखी पहचान प्रेम का यह स्मारक है।
किसी भी श्मशान भूमि पर वहां समाधि लेखों के अनेक नमूने मिल जाएंगे। काव्य, पंक्तियां, सूक्ति वाक्यों, दार्शनिक उक्तियों को नायाब नमूनों का संकलन आसानी से देखने को मिल जाते हैं। इन स्मारकों में कहीं मरने वालों की इच्छानुसार लिखा रहता है। कहीं उनके परिवारजनों की आकांक्षा अनुरूप और कहीं मृतक के अंतिम शब्दों को ही उसकी समाधि पर लिख दिया जाता है। लेकिन हम जिस स्मारक की बात कर रहे हैं वह अपने आप में एक अनूठी कलाकृति का उदाहरण है। वैलेंटाइन डे पर बरबस ही इस मोहब्बत की स्मारक की याद आ जाती है।
चार भाषाओं में लिखी है दिल की बात
लक्ष्मीकांत मिस्त्री मकान बनाने का काम करते थे। उन्हें कविताएं लिखने का भी शौक था। उनकी पत्नी रमा का निधन तेज बुखार के चलते हो गया था। उन्होंने अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार के बाद शाम को मुक्तिधाम में अपनी पत्नी की याद में कुछ ऐसा किया कि वह हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो गए। हटा के मुक्तिधाम में एक बड़े पत्थर का सीना छैनी-हथौड़े से चीरकर चार भाषाओं में पत्नी की याद में लक्ष्मीकांत ने अपने प्रेम की इबारत लिख डाली।
पत्नी की याद में 1921 में बनाया था स्मारक
मुक्तिधाम में स्थापित यह स्मारक भले ही ताजमहल की शक्ल न लिए हो मगर उसकी स्वर्णिम पृष्ठ भूमि पर ध्यान आकर्षित करने मात्र से ही इस स्मारक का सौंदर्य ताजमहल से कम नहीं लगता। नगर के साहित्य के मील के पत्थर तराश कर अपनी पत्नी रमा की याद में स्वयं की उंगलियों को घायल कर कवि ने पत्थर तराश कर अपनी पत्नी की याद में इस स्मारक का निर्माण किया था, जो आज भी प्रेम की अविरल गाथा गा रहा है। लक्ष्मीकांत मिस्त्री ने यह स्मारक 1921 में बनाया था।
पश्चिम दिशा में बना है यह स्मारक
हटा के श्मशान घाट के पश्चिम दिशा में बने इस स्मारक के नजदीक जाने से विलक्षण होने का प्रमाण देखते ही बनता है। स्मारक के चारों ओर हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू और संस्कृत भाषा से परिपूर्ण पंक्तियां स्वयं लक्ष्मीकांत मिस्त्री ने छैनी हथौड़े से उकेरी थीं, जिस तरह ऊपर सहजता से पत्नी रमा के नाम का उल्लेख किया किया गया है। दिन के उजाले में पति छैनी, हथौड़े से पत्थर को तराशते तो रात के अंधेरे में कई पत्रिकाओं के लिए भी लिखते थे। इस साहित्यकार के सम्पूर्ण साहित्य को तो नहीं सहेजा जा सका, पर उनके द्वारा निर्मित इस स्मारक को जरूर सहेजा जा सकता है।
कवि के नाम पर रखा गया वॉर्ड का नाम
हटा के समाजसेवी और वरिष्ठ पत्रकार डॉक्टर विजय बजाज ने बताया कि लक्ष्मीकांत मिस्त्री ने अपनी पत्नी रमा की याद में मुक्तिधाम में इस शिलालेख पर अपने दिल की बात उकेरी थी। उनकी पत्नी के नाम से बाद में इसे रमा कवि वॉर्ड भी घोषित किया गया। नगर पालिका के 15 वॉर्डों में यह भी एक वार्ड है। वहीं, रचनाकार अजीत अवस्थी बताते हैं कि रमा कवि के साहित्य को सहेजने की आवश्यकता है।
प्रसिद्ध साहित्यकार थे रमा कवि
नगर पालिका हटा की परिधि में शामिल रमा कवि वॉर्ड जो इन्हीं कवि के नाम है। इनका वास्तविक नाम लक्ष्मीकांत मिस्त्री रमा कवि था, जो पेशे से कारीगरी राज मिस्त्री कार्य करते थे और प्रतिदिन रात में चिराग के उजाले में उस वक्त श्रेष्ट कविताएं लिखा करते थे। देश के नामचीन कवियों मे शुमार बाला दुष्यंत, नागार्जुन और मुक्तिबोध भी इन्हें कविताकर्म से पहचानते थे। रमा कवि श्रेष्ठ कवि कहे जाते थे। मप्र के प्रसिद्ध साहित्यकार और हटा निवासी पंडित श्याम सुंदर दुबे द्वारा रमाकवि पर कुछ लोगों को सागर के डॉक्टर हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय में पीएचडी शोध भी कराया गया है। स्मारक को सहेजने और संरक्षण को लेकर हटा के पूर्व विधायक पीएल तंतुवाय ने पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद पटेल को एक डीपीआर रिपोर्ट भी दी थी ताकि इस स्मारक के सुधार और रखरखाव का काम किया जा सके, लेकिन अभी तक इस और काम शुरू नहीं हो सका।
अमिट प्रेम की गाथा है यह स्मारक
शिक्षक माधव पटेल के अनुसार, बुंदेलखंड और एमपी के प्रसिद्ध कवि और साहित्यकार रहे रमा कवि, जिन्होंने अपनी पत्नी की याद में हटा में यह स्मारक बनाया है। उनकी पत्नी की मौत 24 साल की उम्र में हो गई थी। यह स्मारक अमिट प्रेम की निशानी है। प्रेम के अनुपम उदाहरण को अगर किसी को देखना है, तो रमा कवि द्वारा स्थापित इस स्मारक को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रेम की क्या परिभाषा है।