कल्पना कीजिए... पेट में तेज दर्द से एक महिला तड़प रही हो और उसे अस्पताल ले जाने के लिए एंबुलेंस तो दूर, गांव तक वाहन पहुंचने का रास्ता भी नहीं हो। ऐसे में परिवार के लोग लाठी और साड़ी से डोली बनाते हैं, मरीज को उसमें बैठाते हैं और उफनती नदियों के बीच से पैदल निकल पड़ते हैं। जुन्नारदेव के ग्राम पील्हावाड़ी में शनिवार को ऐसा ही हुआ। 22 वर्षीय कड्डे पति राजू ढीकू को शनिवार सुबह अचानक पेट में तेज दर्द हुआ। हालत देखकर परिजनों ने अस्पताल ले जाने का फैसला किया, लेकिन बारिश के कारण गांव से बाहर निकलने वाला रास्ता बंद था। मजबूरी में गांव के लोगों ने लाठी में साड़ी बांधकर डोली बनाई और महिला को उसमें बैठाकर अस्पताल के लिए निकल पड़े।
डोली में मरीज...कंधों पर इलाज की उम्मीद
महिला को डोली में बैठाकर चैतराम भोपा, बारेलाल भोपा, हीरो दर्शमा और सुकरलाल ढीकू समेत परिजन पैदल निकले। हर कदम पर रास्ता चुनौती बनता गया। कहीं कीचड़, कहीं पथरीला रास्ता तो कहीं उफनती नदी। पील्हावाड़ी से झालमऊ के बीच डोबरी डोह और दानी घाट नदी को परिजनों ने किसी तरह पार किया। महिला को डोली समेत नदी पार कराना आसान नहीं था। पानी के बहाव और फिसलन के बीच ग्रामीणों ने सावधानी से रास्ता तय किया।
रिंदों नदी ने रोका रास्ता, फिर जंगल का सहारा
झालमऊ के पास पहुंचने पर रिंदों नदी में पानी का बहाव काफी ज्यादा मिला। नदी पार करना जोखिम भरा था। रास्ता बंद देखकर परिजनों ने दूसरा रास्ता चुना। पहाड़ के किनारे बनी पथरीली जंगल की पगडंडी से लंबा चक्कर काटते हुए वे ग्राम कट्टा (बिचबेहरी) पहुंचे। करीब छह घंटे तक चले इस सफर में परिवार की चिंता लगातार बढ़ती रही। आखिरकार कट्टा पहुंचने के बाद चौपहिया वाहन की व्यवस्था हो सकी। वहां से करीब 13 किलोमीटर का सफर तय कर महिला को दमुआ लाया गया।
गांव से अस्पताल तक पहुंचने में लगे छह घंटे
दमुआ पहुंचने के बाद महिला को निजी चिकित्सक के क्लीनिक में भर्ती कराया गया। फिलहाल उसका इलाज जारी है। परिजनों के लिए सबसे बड़ी चुनौती महिला को अस्पताल तक पहुंचाना रही। पील्हावाड़ी निवासी मन्नू ढीकू ने बताया कि बारिश के दिनों में गांव की स्थिति बेहद खराब हो जाती है। सड़क और आवागमन की सुविधा नहीं होने से बीमार व्यक्ति को अस्पताल ले जाना किसी चुनौती से कम नहीं है।
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बारिश में गांव बन जाता है टापू
ग्रामीणों का कहना है कि बारिश शुरू होते ही पील्हावाड़ी का मुख्यालय से संपर्क लगभग टूट जाता है। सामान्य दिनों में किसी तरह आवागमन हो जाता है, लेकिन बारिश में रास्ते कीचड़ और पानी से भर जाते हैं। कई स्थानों पर नदियों का जलस्तर बढ़ जाता है। बाइक तक गांव में नहीं पहुंच पाती। ऐसे में अगर किसी की तबीयत अचानक बिगड़ जाए तो पहले मरीज को डोली में बैठाकर पैदल गांव से बाहर निकालना पड़ता है और फिर वाहन मिल पाता है।
सवाल यही- सड़क कब मिलेगी?
शनिवार की घटना ने गांव की मूलभूत सुविधाओं पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। एक ओर सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने की बात होती है, दूसरी ओर पील्हावाड़ी जैसे गांवों में आज भी मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए डोली, नदी और जंगल का सहारा लेना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क सुविधा मिलने से न सिर्फ रोजमर्रा का आवागमन आसान होगा, बल्कि आपात स्थिति में मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाया जा सकेगा। शनिवार को कड्डे को अस्पताल पहुंचाने में छह घंटे लगे, लेकिन सवाल यह है कि अगर स्थिति और गंभीर होती तो क्या छह घंटे का यह सफर किसी की जान बचा पाता?