छतरपुर जिला अस्पताल के बाहर एक ऐसी तस्वीर देखने को मिली, जिसने लाखों की जीवनदायिनी वेंटिलेटर मशीन की सुरक्षा और प्रशासन की जिम्मेदारी पर सवाल खड़े कर दिए। अस्पताल गेट के बाहर धूल और गंदगी में यह मशीन मानो अपने खराब होने की गवाही खुद दे रही थी।
यह वेंटिलेटर मशीन, जो आईसीयू में मरीजों को नई जिंदगी देने के लिए बनाई गई है, अस्पताल गेट के बाहर खुले में धूल खा रही है। चारो ओर उड़ती धूल, मिट्टी और गंदगी ने इसे जैसे अपनी चादर में लपेट लिया है। पास ही अस्पताल के नए भवन का निर्माण कार्य जारी है, जिससे उठ रही धूल सीधे इस मशीन पर जम रही है। स्थानीय लोग और जानकार इसे लापरवाही की पराकाष्ठा मान रहे हैं। एक नागरिक ने कड़े शब्दों में कहा, क्या यह मशीन किसी का जीवन नहीं बचा सकती? फिर इसे यूं बाहर क्यों छोड़ दिया गया है?
लाखों की मशीन, लेकिन देखरेख से दूर
जानकार बताते हैं कि वेंटिलेटर जैसी मशीनों को एयर-प्रूफ और नियंत्रित वातावरण में रखना अनिवार्य होता है। कीमत लाखों में होने के बावजूद इसे इस तरह खुले में छोड़ देना, न सिर्फ गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि इसकी कार्यक्षमता को भी खतरे में डाल सकता है। एक विशेषज्ञ ने कहा, इस तरह की संवेदनशील मशीन का सही रखरखाव न किया गया तो यह पूरी तरह खराब हो सकती है।
प्रधानमंत्री की यात्रा और 'तैयारियों की जल्दबाजी'
दरअसल, इस मशीन को खजुराहो ले जाया जा रहा है, जहां 24 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केन-बेतवा लिंक परियोजना का भूमि पूजन करेंगे। उनकी स्वास्थ्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए छतरपुर अस्पताल के आईसीयू से यह वेंटिलेटर मशीन निकाली गई। लेकिन, गाड़ी समय पर न पहुंचने के कारण इसे अस्पताल के बाहर खुले में रख दिया गया। करीब एक घंटे तक गाड़ी का इंतजार करती यह मशीन, जिम्मेदारी के धरातल पर प्रशासन की लापरवाही को उजागर करती रही। अस्पताल प्रशासन का कहना है, "गाड़ी के देर से आने की वजह से मशीन बाहर रखी गई। जैसे ही मामला सामने आया, मशीन को अंदर ले जाने का इंतजाम किया गया।"
क्या जवाबदेही का दम टूट रहा है?
वेंटिलेटर मशीन को ऐसे खुले में रखना यह दर्शाता है कि जीवनदायिनी उपकरणों के प्रति हमारी जिम्मेदारी कितनी कमजोर है। इस घटना ने न केवल प्रशासन की तैयारियों की पोल खोली, बल्कि यह भी बताया कि एक छोटी सी चूक कितनी बड़ी समस्या खड़ी कर सकती है। क्या यह लापरवाही सिर्फ एक घटना है या हमारे सिस्टम की आदत बन चुकी है? सवाल उठता है कि जिन उपकरणों पर मरीजों की जान टिकी होती है, क्या उनका ऐसा असंवेदनशील उपयोग उचित है?