झाबुआ के आदिवासी ऐसे मतदाता है, जो कांग्रेस को पंजे वाली कांग्रेस और भाजपा को फूल वाली कांग्रेस कहते हैं। और यह बात वे भाजपा में कांग्रेसियों के शामिल होने के कारण नहीं कहते। बल्कि उनके लिए राजनीतिक दल का अर्थ है, कांग्रेस।
पिछले कुछ वर्षों में काम की तलाश में गुजरात जाने वाले आदिवासियों के लिए अब राजनीतिक दल का अर्थ सिर्फ कांग्रेस नहीं रह गया है। मोदी भी हो गया है।
करीब 7-8 लाख मजदूर रतलाम-झाबुआ से जाकर गुजरात में काम करते हैं। विधानसभा चुनाव में ये मजदूर अपने स्थान में लौट आए। मोदी से प्रभावित इन मजदूरों ने पांसा पलट दिया। वहां राजनीतिक दल का अर्थ केवल कांग्रेस नहीं रह गया था।
टीवी नहीं, फिर भी मोदी
विधानसभा चुनाव-2013 के जैसे ही नतीजे आए, प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया सारा काम छोड़कर अपने लोकसभा क्षेत्र की ओर रवाना हो गए।
उन्होंने उसके बाद सारी ताकत अपने संसदीय क्षेत्र में लगा दी। वहां की सारी विधानसभा सीटें भाजपा जीत गई।
रतलाम भाजपा के आईटी सेल में पदाधिकारी राशिद आलम छोटे कारोबारी हैं। उनका कहना है, ‘रतलाम इलाके से तो कांतिलाल भूरिया कभी जीतते नहीं। वे आदिवासी बहुल इलाकों से जीतते हैं। अब वहां भी उनके लिए लड़ाई मुश्किल हो गई है।’
रतलाम से जुड़े शहरी और कस्बाई इलाकों में मोदी का जिक्र करते लोग नजर आते हैं। आदिवासी इलाकों में गुजरात जाने वाले श्रमिकों ने मोदी को उन इलाकों तक पहुंचा दिया है, जहां न बिजली है, न रेल है और न टेलीविजन।
अलीराजपुर, जोबट, थांदला, झाबुआ और पेटलावद के इलाकों में कांतिलाल भूरिया की अच्छी पकड़ रही है। प्रवासी मजदूरों के कारण उन्हीं इलाकों में लोग मोदी का नाम भी जानने लगे हैं।
मनी का माइक्रो-मैनेजमेंट
आदिवासी इलाकों में शराब और पैसे का प्रबंधन चुनावों में खासा चर्चित रहा है। आंकड़े बता रहे हैं कि 1 अप्रैल से 20 अप्रैल 2014 के दौरान 87.79 लाख लीटर देसी शराब बिक चुकी है, जो 1 अप्रैल से 20 अप्रैल 2013 के दौरान 79.49 लाख लीटर बिकी थी।
रतलाम क्षेत्र में जनता दल (यू) के उम्मीदवार भैरोंसिंह डामोर के पक्ष में प्रचार कर रहे प्रदेश अध्यक्ष गोविंद यादव बताते हैं, ‘एक समय मामा बालेश्वर दयाल का कार्यक्षेत्र था, झाबुआ का यह आदिवासी इलाका।
जब से चुनाव आयोग ने पार्टियों के प्रचार पर सख्ती की है, मनी मैनेजमेंट अब माइक्रो लेवल पर चला गया है। पहले मैक्रो लेवल पर खर्च होता था।’
आदिवासी युवक बताते हैं कि किस तरह कई स्वयं सेवी संगठन आदिवासी नौजवानों को अपने रोल पर रखकर 300 से 2000 रुपए तक बिना काम के दे रहे हैं।
रेल एक मुद्दा
धार, बड़वानी, अलीराजपुर, झाबुआ, खरगौन, डिंडौरी जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में रेलवे लाइन नहीं है। कांतिलाल भूरिया ने ट्रेन देने का वादा किया था।
2008 में शिलान्यास होने के बाद भी आज तक कोई काम नही हो पाया है। कांतिलाल भूरिया भी केंद्र में मंत्री रहे। इसलिए लोगों में कांतिलाल भूरिया के लिए नाराजगी दिखाई तो देती है।
लेकिन दिलीपसिंह भूरिया के पक्ष में भी कोई उत्साह दिखाई नहीं देता।
आदिवासी इलाकों में समाजवादी विचार के अवशेष बचाने में लगे गोविंद यादव की राय है, ‘दिलीपसिंह भूरिया के पक्ष में भी कोई उत्साह नहीं है। अब होगा यह कि जो मैनेजमेंट अच्छा कर लेगा, वह जीत जाएगा।’
दिलीपसिंह भूरिया अलग आदिवासी राज्य की मांग करते रहे हैं और नरेंद्र मोदी के साथ अपनी निकटता का लाभ चुनाव में उठाना चाहते हैं।
कांतिलाल भूरिया के बेटे विक्रांत यादव जहां नौजवान मतदाताओं को लुभाने में लगे हैं, वहीं नरेंद्र मोदी भी भाषण में समझा रहे हैं कि 18 से 28 साल का समय जिंदगी में सबसे ज्यादा निर्णायक है, सोच-समझकर फैसला लेना। करीब एक तिहाई वोटर 18-30 साल का है। निर्णय करने में इसकी भूमिका अहम होगी।