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खंडवाः त्रिकोण के बीच फंसे अरुण यादव

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अरुण यादव के लिए खंडवा-बुरहानपुर लोकसभा सीट इसलिए प्रतिष्ठा का प्रश्न है कि वह मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष हैं और सुभाष यादव के बेटे हैं।
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नंदकुमार चौहान के लिए खंडवा का मुकाबला जीतना इसलिए प्रतिष्ठा का प्रश्न है कि वे इस सीट से चार बार सांसद और तीन बार विधायक रह चुके हैं।

मंत्री कैलाश विजयवर्गीय खुद खंडवा के चुनाव का प्रबंधन देख रहे हैं। आम आदमी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष आलोक अग्रवाल के पास खोने के लिए कुछ नहीं है।

उनके नर्मदा बचाओ आंदोलन की टीम ही अब उनकी पार्टी बन गई है, कुछ नया है तो आम आदमी वाली टोपियां, जो छोटी-छोटी टीमों के रूप में नजर आती हैं।

तीन अहम सवाल हैं। क्या डूब प्रभावित आदिवासी व किसान, आलोक अग्रवाल को जिता पाएंगे? शिवराज मंत्रिमंडल में मंत्री विजय शाह के भाई अजय शाह को बैतूल से टिकट देने के बाद क्या कांग्रेस आदिवासियों के वोट हासिल कर पाएगी? क्या विधानसभा चुनावों में मिली सफलता को भाजपा दोहरा पाएगी?

बड़वाह के कमलेश अभी कॉलेज में पढ़ रहे हैं। उनका कहना है, ‘फैसला करने वाले वे लोग हैं, जिन्हें बिजली चाहिए, पानी चाहिए, नौकरियां चाहिए। डूबने वाले फैसला कहां करते हैं?’
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वोट का गणितः

यही कारण है कि 24 अप्रैल को होने वाला खंडवा का चुनाव मध्य प्रदेश के सबसे कड़े संघर्षों में से एक बन गया है।

विधानसभा चुनावों में भाजपा ने आठ में से सात सीटें जीती थीं। उस समय ‘आप’ का कोई वजूद नहीं था। अब भाजपा के लिए उन सातों सीटों पर अपनी बढ़त बरकरार रखना एक मुश्किल काम में बदल गया है।  

खंडवा लोकसभा सीट के तहत बागली (एसटी), भीकनगांव (एसटी), बड़वाह, खंडवा (एससी), मंधाता, पंधाना (एसटी), बुरहानपुर व नेपानगर (एसटी) आती हैं। खंडवा सीट पर सबसे अहम मतदाता आदिवासी और मुस्लिम होता है।

जहां आदिवासी मतदाताओं की तादाद 30 फीसदी है, वहीं मुस्लिम मतदाता 17 फीसदी है। भीकनगांव को छोड़कर भाजपा ने अगर सात विधानसभाएं अपने कब्जे में कर ली थीं तो उसका खास कारण यह था कि कांग्रेस के परंपरागत आदिवासी वोटों में भाजपा ने सेंध लगा ली थी।

संघर्ष इतना कड़ा है कि नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी सभाएं ले चुके हैं। प्रदेश कांग्रेस के तमाम बड़े नेता यहां सभाएं कर रहे हैं। शिवराज सिंह चौहान सभाएं ले चुके हैं। रोजाना कोई न कोई स्टार प्रचारक चला आ रहा है।

खंडवा के छोटे कारोबारी मनोज कुमार मजाकिया लहजे में बताते हैं, ‘यहां पैसा डैम में जमा पानी की तरह बहाया जा रहा है। दोनों पार्टियां सॉलिड हैं। दोनों की नाक का सवाल है। जो ज्यादा माल ढीला करेगा, जीत जाएगा।’

‘आप’ के आलोकः

महज 12,871 रुपए की कुल संपत्ति बताने वाले आलोक अग्रवाल आईआईटी-कानपुर के इंजीनियर हैं।

किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी की नौकरी करने के बजाय नर्मदा बचाओ आंदोलन का रास्ता अख्तियार करने वाले आलोक अग्रवाल का यदि कोई राजनीतिक जनाधार कहा जाए तो वह बांधों के कारण होने वाले विस्थापित किसान और आदिवासी हैं।

बागली, मंधाता, बड़वाह, खंडवा और भीकनगांव जैसे इलाकों में आलोक अग्रवाल और उनके साथी पिछले 20 वर्षों से लगातार काम कर रहे हैं। यही कारण है कि आलोक के लिए सभाएं लेने वालों में मेधा पाटकर, चितरूपा पालित से लेकर वे तमाम आंदोलनकारी चेहरे नजर आते हैं, जो एनबीए के लिए काम करते रहे हैं।

आलोक अग्रवाल की शैली घर-घर जाकर और नुक्कड़ सभाओं के जरिए प्रचार करने की है। आलोक के बारे में कहा जा रहा है कि उन्होंने दोनों ही प्रमुख दलों के उम्मीदवारों की नींद हराम कर दी है, लेकिन वह जीतने की स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि शहरी जनसंख्या को बिजली चाहिए, किसानों को पानी चाहिए और आम आदमी पार्टी की प्रतिष्ठा भी पहले जैसी नहीं रही।

सुप्रीम कोर्ट ने बांध की ऊंचाई बढ़ाने पर तब तक रोक लगा दी है, जब तक विस्थापितों को जमीन के बदले जमीन नहीं मिल जाती। यहां आप का मतलब एनबीए है।

खंडवा में सौदा करने आए किसान करणसिंह का कहना है, ‘एनबीए के लोग लड़ाई नहीं लड़ते तो आज गरीब किसानों और आदिवासियों की कौन सुनता। सरकारें गूंगी-बहरी हो चुकी हैं। हमारे लिए तो दोनों पार्टियां अत्याचारी हैं।’

मोदी के पक्ष में माहौल

अरुण यादव के लिहाज से देखा जाए तो वह दोतरफा लड़ाई का मुकाबला कर रहे हैं।

एक तरफ मोदी के पक्ष में बना माहौल है। दूसरी तरफ आलोक अग्रवाल उनसे आदिवासी वोट झटक सकते हैं।

अरुण यादव ने चुनाव के ठीक पहले राजनीतिक शतरंज का एक अहम मोहरा चला था। शिवराज मंत्रिमंडल के मंत्री और आदिवासी नेता विजय शाह के भाई अजय शाह को कांग्रेस ने बैतूल से टिकट दिया है।

यह आदिवासी राजघराना आदिवासी मतों पर खासा प्रभाव रखता है। यदि अजय शाह आदिवासी मतों को अरुण यादव के पक्ष में लाने में सफल हो जाते हैं तो नतीजे बदल सकते हैं।
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भाजपा की राह आसान नहीः

जहां प्रदेश की ज्यादातर सीटों पर भाजपा के लिए मोदी और शिवराज फैक्टर ने मिलकर राह आसान कर दी है, वहीं खंडवा सीट पर यह राह आसान नहीं है।

नरेंद्र मोदी की सभा हो चुकी है। प्रदेश भाजपा का प्रमुख अमला लग चुका है। 24 अप्रैल के चुनावों के लिए जब भाजपा के रणनीतिकारों की टीम ने इंदौर में अपना अड्डा बनाया तो उसका एक प्रमुख कारण खंडवा की सीट का संघर्ष भी है।

भाजपा खंडवा सीट को हासिल करके यह संदेश भी देना चाहती है कि कांग्रेस को चारो खाने चित कर दिया है। त्रिकोणीय संघर्ष में भाजपा के पक्ष में पलड़ा झुका होने के बाद भी उसकी राह आसान नहीं है।
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