बीमारी की पहचान के बाद दवा देने की पारंपरिक व्यवस्था अब तेजी से बदल रही है। मरीज की प्रतिरक्षा क्षमता और बीमारी के बीच संबंध को समझकर सटीक जांच और उसी के आधार पर उपचार की दिशा में चिकित्सा विज्ञान आगे बढ़ रहा है। इसी भविष्य की चिकित्सा पर भोपाल में देशभर के विशेषज्ञ दो दिन तक मंथन कर रहे हैं। भोपाल स्मारक अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र में बुधवार से इम्युनोडायग्नोस्टिक्स और वैक्सीन विकास पर दो दिवसीय सीएमई एवं व्यावहारिक कार्यशाला शुरू हुई। भारतीय इम्यूनोलॉजी सोसाइटी के तत्वावधान में हो रही कार्यशाला में करीब 75 शोधार्थी और प्रतिभागी शामिल हुए। एक ही बीमारी, लेकिन इलाज का तरीका अलग हो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक प्रतिरक्षा तंत्र हर व्यक्ति में एक जैसा व्यवहार नहीं करता। ऐसे में बीमारी की सटीक पहचान के साथ शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को समझना भविष्य के उपचार में अहम भूमिका निभा सकता है।
आधुनिक जांच तकनीकों से बीमारी की अधिक सटीक पहचान
एम्स दरभंगा के निदेशक प्रो. माधवनंद कर ने कहा कि सही समय पर सही निदान और उसके अनुसार उपचार मरीज की प्राथमिक जरूरत है। आधुनिक जांच तकनीकों से बीमारी की अधिक सटीक पहचान संभव हो रही है, जिससे उपचार को बेहतर तरीके से तय किया जा सकता है।
वैक्सीन ने हर मिनट बचाई 6 जिंदगियां
एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) डॉ. नरेंद्र कोतवाल ने वैक्सीन के महत्व को बताते हुए कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार करीब 14 बीमारियों से बचाव के लिए विकसित टीकों के कारण पिछले 50 वर्षों में हर मिनट लगभग छह लोगों की जान बचाई जा रही है। उन्होंने शोधार्थियों को अनुसंधान में ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और लगातार मेहनत को सफलता का आधार बनाने की सलाह दी।
कोविड ने बदल दी प्रतिरक्षा विज्ञान की तस्वीर
एनआईआरईएच भोपाल के निदेशक डॉ. राजनारायण तिवारी ने कहा कि पहले प्रतिरक्षा और वैक्सीन को मुख्य रूप से संक्रामक बीमारियों से जोड़कर देखा जाता था। कोविड महामारी ने इस सोच को बदल दिया।
अब प्रतिरक्षा विज्ञान का इस्तेमाल केवल संक्रमण तक सीमित नहीं है। गैर-संचारी बीमारियों में भी शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को समझना महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
वायरस बदल रहे, इसलिए शरीर को भी तैयार करना होगा
जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर संतोष कुमार कर ने कहा कि वायरस में लगातार बदलाव के कारण नए रोग सामने आ रहे हैं। ऐसे में जीवनशैली में बदलाव और प्रतिरक्षा क्षमता को बेहतर रखना भी जरूरी है।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में करीब 1600 विश्वविद्यालयों में प्रतिरक्षा विज्ञान पढ़ाया जा रहा है।
बीएमएचआरसी में मरीजों के आंकड़ों से लेकर शोध तक बदलाव
बीएमएचआरसी की प्रभारी निदेशक डॉ. मनीषा श्रीवास्तव ने बताया कि संस्थान आधुनिक जांच और अनुसंधान के साथ मरीजों की सुविधाओं को भी मजबूत करने पर काम कर रहा है। मरीजों के आंकड़ों को ई-सुश्रुत सॉफ्टवेयर से जोड़ने की दिशा में काम चल रहा है। संस्थान के आठ सामुदायिक केंद्रों से गैस पीड़ितों और उनके आश्रितों को निशुल्क उपचार और दवाएं दी जा रही हैं। सिकल सेल एनीमिया और टीबी उन्मूलन के साथ किडनी मरीजों के लिए नियमित डायलिसिस की सुविधा भी उपलब्ध है।
यह भी पढ़ें-72 घंटे की हड़ताल से चरमराई स्वास्थ्य व्यवस्था: हमीदिया में 50 से ज्यादा ऑपरेशन टले, MBBS इंटर्न की मांग पूरी
अगले दिन ऑटोइम्यून बीमारियों पर फोकस
कार्यशाला के दूसरे दिन ऑटोइम्यून बीमारियों की पहचान, इम्यूनोग्लोबुलिन के शुद्धिकरण और नई जांच तकनीकों पर चर्चा होगी। विशेषज्ञों और शोधार्थियों के बीच व्यावहारिक प्रशिक्षण तथा समूह चर्चा भी होगी।