अंग्रेजी शब्दों को गजल की भाषा में घोलने वाले शायर
डॉ. बाराबंकी के मुताबिक बशीर बद्र की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने अंग्रेजी के शब्दों को बेहद सहजता से उर्दू शायरी का हिस्सा बनाया। गिलास, रिबन, सूट जैसे शब्द उनकी गजलों में इस तरह घुले-मिले दिखाई देते हैं कि वे अलग से विदेशी नहीं लगते। उन्होंने शब्दों के चयन और प्रयोग से गजल को नई अभिव्यक्ति दी।
छोटे रचनाकारों के लिए हमेशा खुले रहे दरवाजे
बशीर बद्र के साथ अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए डॉ. बाराबंकी ने कहा कि वे हमेशा युवा और नए रचनाकारों को आगे बढ़ाने के लिए तत्पर रहते थे। शोहरत के शिखर पर पहुंचने के बावजूद उनमें अहंकार नहीं था। वे अपने से जूनियर लेखकों और शायरों को मंच देने, उनका मार्गदर्शन करने और प्रोत्साहित करने में विश्वास रखते थे।
हर बड़े गायक ने गाई उनकी गजलें
डॉ. बाराबंकी के अनुसार देश का शायद ही कोई बड़ा गजल गायक या लाइट म्यूजिक कलाकार हो जिसने बशीर बद्र की रचनाओं को आवाज न दी हो। उनकी शायरी आम लोगों से लेकर साहित्यिक मंचों तक समान रूप से लोकप्रिय रही। बशीर बद्र के निधन के साथ उर्दू अदब का एक ऐसा अध्याय समाप्त हो गया, जिसने गजल को नई भाषा, नया मुहावरा और नई पहचान दी। साहित्य जगत उन्हें एक ऐसे शायर के रूप में याद करेगा, जिसने शब्दों को आम आदमी के दिल तक पहुंचाने का काम किया।
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बेहद सरल, मिलनसार और जमीन से जुड़े इंसान
उनके करीबी रिश्तेदार सैयद इफ्तिखार अली और बेटे तय्यब बद्र ने उन्हें याद करते हुए कहा कि बशीर बद्र केवल बड़े शायर ही नहीं, बल्कि बेहद सरल, मिलनसार और जमीन से जुड़े इंसान थे। उनकी पहचान इतनी व्यापक थी कि भोपाल में उनका नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं था। सैयद इफ्तिखार अली ने बताया कि जब बशीर बद्र मेरठ से भोपाल आए थे, तब सदर मंजिल के पीछे स्थित वाहिद मंजिल में अक्सर साहित्यिक नशिस्तें हुआ करती थीं। उनकी महफिलों में इतनी भीड़ जुटती थी कि बड़ा मैदान भी छोटा पड़ जाता था। उन्होंने कहा कि बशीर बद्र को पद्मश्री सम्मान मिला, लेकिन शोहरत के बावजूद उनमें कभी अहंकार नहीं आया।
उन्होंने याद किया कि एक बार दुबई में उनका चश्मा टूट गया था। जब वे उसे ठीक कराने पहुंचे तो दुकानदार ने पैसे लेने से इनकार कर दिया। इसके बावजूद बशीर बद्र लगातार भुगतान करने की जिद करते रहे। यह उनके स्वाभिमान और सादगी का बड़ा उदाहरण था।
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