देश में लाए गए चीतों में से आठ की मौत के बात प्रोजेक्ट पर सवाल उठने लगे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि अफ्रीका से लाए गए चीतों में से आठ की मौत एक साल के भीतर हो गई। यह प्रोजेक्ट चीता की अच्छी तस्वीर पेश नहीं करता। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कहते हुए केंद्र सरकार को चीतों की मौतों को रोकने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी है और साथ ही चीतों की हुई मौतों के कारण भी।
एक साल में 40 प्रतिशत मौत
जस्टिस बीआर गवई, जेबी पारदीवाला और प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने पूछा कि सरकार ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न क्यों बना लिया है। उन्हें एक जगह रखने के बजाय आप उनके लिए एक से ज्यादा आवास क्यों विकसित नहीं करते, फिर भले ही कोई भी राज्य या किसी भी सरकार हो। एक साल के भीतर 40% मौतें हो गईं और इससे अच्छी तस्वीर नहीं बन रही है।
अब 16 चीते शेष
मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से दो बैच में 20 चीतों को लाकर बसाया गया है। सितंबर में नामीबिया से आठ चीते लाए गए थे और फरवरी 2023 में 12 चीते दक्षिण अफ्रीका से। भारत में 1952 में चीते विलुप्त हो गए थे और उसके सात दशक बाद यह भारत में बसाने की पहल के तौर पर प्रोजेक्ट चीता ने आकार लिया है। जिन आठ चीतों की मौत हुई हैं, उनमें तीन वयस्क चीते हैं जिन्हें खुले जंगल में छोड़ा गया था। दो चीतों की मौत बाड़े में ही हुई है। वहीं कूनो में चार शावकों का जन्म हुआ था, जिनमें से तीन की मौत हो चुकी है। अब कूनो में 16 चीता हैं, जिनमें एक शावक भी शामिल है।
क्या पर्यावरण रास नहीं आ रहा?
एमके रणजीतसिंह के नेतृत्व वाली कमेटी कोर्ट की मदद कर रही है। कमेटी ने कोर्ट को बताया कि सरकार ने जो टास्क फोर्स बनाई है, उसमें एक भी चीता एक्सपर्ट नहीं है। पिछले हफ्ते दो चीतों की मौत के बाद कमेटी ने कोर्ट से कहा था कि इस मामले की जल्द से जल्द सुनवाई करें। हालांकि, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को बताया कि यह देश के लिए एक प्रतिष्ठित प्रोजेक्ट है। इस तरह के प्रोजेक्ट में पहले साल में 50% मौतें अपेक्षित स्तर पर थीं। भाटी से कोर्ट ने पूछा कि हम जानना चाहते हैं कि समस्या क्या है। ऐसा लग रहा है कि उन्हें हमारा मौसम और पर्यावरण रास नहीं आ रहा है। उन्हें सांस लेने की दिक्कतें हो रही हैं। एक चीता की मौत किडनी की बीमारी की वजह से हुई है।