कर्नाटक चुनाव नतीजों से पहले तक भाजपा के पास एंटी-इनकम्बेंसी को परास्त करने दो मॉडल थे। गुजरात में जीत तक पहुंचाने वाला मॉडल, जिसमें 40 प्रतिशत टिकट काटे गए थे। मुख्यमंत्री समेत मंत्रिमंडल बदल दिया गया था। दूसरा, कर्नाटक का मॉडल, जहां नेता पुत्रों और रिश्तेदारों को मौका दिया गया। कर्नाटक मॉडल को लोगों ने पसंद नहीं किया और भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा। ऐसे में मध्य प्रदेश में बेटे-बेटी और रिश्तेदारों को टिकट देकर वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी दूर करने का फॉर्मूला खटाई में पड़ गया है। ऐसे में मध्य प्रदेश में भाजपा को अपनी रणनीति पर दोबारा काम करना होगा।
कर्नाटक चुनाव में भाजपा को बड़ा झटका लगा है। हिमाचल के बाद कर्नाटक में मिली हार ने मध्यप्रदेश समेत पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा की रणनीति की समीक्षा करने को मजबूर कर दिया है। अब यह सवाल दोबारा खड़ा हो गया है कि मध्य प्रदेश में कनार्टक का फॉर्मूला आजमाएं या गुजरात के जीत के शर्तिया मॉडल की ओर जाए। गुजरात में पिछले साल विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सत्ता विरोधी लहर को मात देकर बड़ी जीत दर्ज की थी। भाजपा ने 182 विधानसभा सीटों में से 156 पर जीती थी। भाजपा ने गुजरात में चुनाव के 15 महीने पहले मुख्यमंत्री समेत सभी मंत्रियों को बदल दिया था। नए चेहरों को मौका दिया था। इस मॉडल के लिए मध्य प्रदेश में भाजपा को देर हो गई है। मौजूदा स्थिति में व्यापक स्तर पर बदलाव संभव नहीं है।
कर्नाटक की बात करें तो भाजपा ने गुजरात की तर्ज पर मंत्रियों के टिकट काटे। उनकी जगह मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के रिश्तेदारों को टिकट दिए। परिवारवाद का विरोध करने की लाइन के उलट जाकर टिकट वितरण किया। इसके बावजूद भाजपा कर्नाटक का किला नहीं बचा पाई। मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार प्रभु पटैरिया का कहना है कि कर्नाटक के नतीजों के बाद भाजपा दुविधा में है कि वह गुजरात मॉडल की ओर रुख करें या फिर कर्नाटक मॉडल को एक बार फिर आजमाएं। गुजरात मॉडल में चेहरे बदले तो मंत्री-विधायकों के प्रति जनता की नाराजगी दूर करने में मदद मिली। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की इमेज जननायक की है। वह जनता से सीधे जुड़े हैं। ऐसे में भाजपा कोई मिला-जुला फॉर्मूला अपना सकती है।
परिवारवाद पर रुख देखना होगा
भाजपा हमेशा परिवारवाद के खिलाफ बात करती रही है। नेता पुत्रों को हम टिकट नहीं देंगे। कुछ महीने पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भोपाल में कहा था कि कुछ फैसले ऐसे होते हैं, जिसकी वजह से हमें हार का सामना करना पड़ता है। चुनाव नजदीक आते ही भाजपा चुनावी समीकरणों के हिसाब से नीति बना रही है। दमोह में उपचुनाव में पार्टी को हराने वाले सिद्धार्थ मलैया की वापसी हो गई है। कयास हैं कि दमोह से पार्टी उन्हें टिकट देगी। सिद्धार्थ भाजपा के वरिष्ठ नेता जयंत मलैया के बेटे हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश को टिकट दिया था। इस बार कई बड़े नेताओं के बेटे दावेदार हैं। हालांकि, अब कहा जा रहा है कि टिकटों के फैसले में स्थानीय समीकरणों को महत्व मिलेगा।
बेटे-बेटी को मिल सकता है मौका
भाजपा में वरिष्ठ नेताओं के जो बेटे या बेटियां राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा सकते हैं, उन्हें मौका मिल सकता है। इस कड़ी में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बेटे कार्तिकेय, ज्योतिरादित्य सिंधिया के बेटे महाआर्यमन, नरेंद्र सिंह तोमर के बेटे देवेंद्र सिंह, गोपाल भार्गव के बेटे अभिषेक, डॉ. नरोत्तम मिश्रा के बेटे सुकर्ण, कमल पटेल के बेटे सुदीप, प्रभात झा के बेटे तुष्मुल और गौरी शंकर बिसेन की बेटी मौसम शामिल है।