सीएम डॉ. मोहन यादव महामंचन में सम्राट महेन्द्रादित्य के किरदार में
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सम्राट विक्रमादित्य पर केंद्रित महानाट्य का तीन दिवसीय मंचन रविवार से दिल्ली के लाल किले में माधवदास पार्क में शुरू हो रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की राजनीतिक यात्रा जितनी प्रभावशाली रही है, उतनी ही गहराई उनकी सांस्कृतिक जड़ों में भी है। 2000 के दशक की शुरुआत में उज्जैन की पावन भूमि पर जब "सम्राट विक्रमादित्य महामंचन" का मंचन हुआ, तब डॉ. यादव ने उसमें सम्राट विक्रमादित्य के पिता महेन्द्रादित्य की भूमिका निभाई थी। उस समय शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि मंच पर उतरने वाला यह कलाकार एक दिन राज्य का नेतृत्व करेगा। यह महानाट्य सिर्फ एक ऐतिहासिक प्रस्तुति नहीं था, बल्कि एक ऐसे युग की पुनर्स्थापना का प्रयास था, जिसे न्याय, नीति और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतीक माना जाता है। डॉ. यादव का यही सांस्कृतिक रुझान उनके सार्वजनिक जीवन में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
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शहर की चारों दिशा में प्रवेश द्वारों का निर्माण कराया
उज्जैन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष रहते हुए डॉ. यादव ने शहर के विकास को सिर्फ भौतिक ढांचे तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने उज्जैन को सम्राट विक्रमादित्य की दृष्टि से एक सांस्कृतिक नगर के रूप में विकसित करने की परिकल्पना की। उनकी पहल पर शहर की चार दिशाओं में भव्य प्रवेश द्वारों का निर्माण किया गया, जो चार युगों के प्रतीक हैं-एक अभिनव विचार जो उज्जैन को देश का पहला ऐसा शहर बनाता है जहां दिशा-प्रेरित सांस्कृतिक द्वारों से आगंतुकों का स्वागत होता है।
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विक्रम विश्वविद्यालय को नई पहचान
मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. यादव ने सम्राट विक्रमादित्य के नाम से स्थापित विक्रम विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में ठोस कदम उठाए। उन्होंने शैक्षणिक गुणवत्ता, शोध और सम्राट विक्रमादित्य के न्याय-दर्शन व सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए नीतिगत निर्णय लिए।
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अब देशभर में 'विक्रमादित्य महामंचन' की तैयारी
डॉ. यादव अब "सम्राट विक्रमादित्य महामंचन" को देशव्यापी मंच पर ले जाने के लिए तैयार हैं। उनकी योजना है कि यह भव्य नाट्य प्रस्तुति लाल किले जैसे राष्ट्रीय गौरव स्थलों पर की जाए, जिससे भारतीय संस्कृति और इतिहास को नई पीढ़ी के बीच जीवंत रूप में प्रस्तुत किया जा सके।