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MP Election 2023: मराठा आरक्षण ने एमपी में भी बढ़ाई राजनीतिक दलों की टेंशन, चुनाव पर पड़ सकता है असर

Wed, 01 Nov 2023 04:00 PM IST
दिनेश शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल

सार

मध्यप्रदेश में इंदौर ग्वालियर शहर के साथ-साथ, महाराष्ट्र से सटे जिले छिंदवाड़ा, बालाघाट, बैतूल, पांढुर्णा और बुरहानपुर ऐसे हैं, जहां मराठी बोलने वाले निवास करते हैं। मराठा आरक्षण आंदोलन यहां से एमपी में भी दस्तक दे सकता है। यह डर कांग्रेस भाजपा दोनों दलों के नेताओं को है। 
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MP Election 2023 - फोटो : अमर उजाला, इंदौर
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विस्तार
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मध्य प्रदेश के पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र में चल रहे मराठा आरक्षण आंदोलन ने यहां एमपी में भी राजनीतिक दलों की टेंशन बढ़ा दी है। दरअसल, मध्य प्रदेश में इन दिनों विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। प्रदेश में इंदौर ग्वालियर और महाराष्ट्र से सटे जिले छिंदवाड़ा, बालाघाट, बैतूल, पांढुर्णा और बुरहानपुर में बड़ी संख्या में मराठी भाषी लोग निवास करते हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों को यह डर है कि कहीं महाराष्ट्र से उठी आरक्षण की आग मध्यप्रदेश में न आ जाए। क्योंकि इसका असर चुनाव पर पड़ सकता है। हालांकि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही बड़े दल इस पूरे मामले में अभी खुलकर कुछ भी कहने से बचते नजर आ रहे हैं। 
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2018 में बिगाड़ा था गणित
आरक्षण के ही मुद्दे ने 2018 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा का गणित बिगाड़ा था। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का आरक्षण को लेकर दिया गया माई का लाल वाला बयान खास चर्चित हुआ था। ग्वालियर चंबल में इसका सीधा असर देखने मिला था। भाजपा को इस बयान के चलते यहां भारी नुकसान उठाना पड़ा था। ऐसे में एक बार फिर अगर आरक्षण का मुद्दा गूंजता है तो राजनीतिक दलों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। 

ये है मराठा आरक्षण आंदोलन
महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण को लेकर आंदोलन छिड़ा हुआ है। शिवबा नामक संगठन के संस्थापक व समाजसेवी मनोज जरांगे के नेतृत्व में 24 अक्तूबर से यह आंदोलन किया जा रहा है। आंदोलन ने महाराष्ट्र में कई स्थानों पर हिंसक रूप ले लिया है। ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि आंदोलन करने वालों ने कई विधायकों के आवास और सरकारी भवनों पर भी तोड़फोड़ और आगजनी की है। राज्य के कई जिलों में इंटरनेट जैसी सेवाएं भी प्रभावित हैं। इस आंदोलन की शुरुआत मूल रूप से 29 अगस्त से जालना जिले में मराठा समुदाय के लिए आरक्षण की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू हुई थी। हालांकि ये मांग पुरानी नहीं है जो लंबे समय से उठाई जा रही है।
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