भोपाल नगर निगम ने एक अच्छी पहल शुरू की है। शहर में करीब 4 हजार से अधिक जगहों पर विराजमान गणेश प्रतिमाओं के पंड़ालों से प्रतिदिन निकलने वाले फूल-माला इत्यादि सामग्री के प्रबंधन का एक पर्यावरण अनुकूल तरीका खोजा है। जिसमें करीब 100 लोगों को रोजगार भी उपलब्ध हो रहा है। भोपाल नगर निगम के अतिरिक्त आयुक्त देवेंद्र चौहान ने कहा है कि यह पहल न केवल शहर को स्वच्छ रख रही है, बल्कि पवित्र प्रसाद का सम्मानजनक और उत्पादक उपयोग भी कर रही है।
ऐसे हो रहा उपयोग
दरअसल शहर के दानपानी कचरा स्थानांतरण स्टेशन पर एक विशेष प्रसंस्करण संयंत्र स्थापित किया गया है, जहां फूल, नारियल, नारियल के रेशे, अगरबत्ती के अवशेष और अन्य पूजा सामग्री को अगरबत्ती, धूपबत्ती, गुलाल, कोको पीट और रस्सियों में बदला जा रहा है। यह पहल न केवल प्रदूषण को रोकती है, बल्कि लगभग 100 लोगों के लिए रोज़गार भी पैदा करती है।
आस्था और पर्यावरण का मिलन
परंपरागत रूप से, पंडालों से निकलने वाले पूजा के अवशेषों को नालियों या कूड़ेदानों में फेंक दिया जाता था, जिससे जल प्रदूषण, दुर्गंध और भक्तों की भावनाओं को ठेस पहुंचती थी। नई व्यवस्था के तहत, इन पवित्र सामग्रियों को धार्मिक और दैनिक उपयोग की वस्तुओं में पुनर्चक्रित किया जा रहा है, जिससे सम्मान और दोबारा उपयोग भी हो रहा हैं।
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ऐसे हो रहा काम
1. वार्ड स्तर पर विशेष टीमें सात वाहनों की मदद से 10 ज़ोन के 85 वार्डों से सामग्री एकत्र कर रही हैं।
2. वर्तमान में इस संयंत्र में प्रतिदिन लगभग तीन टन सामग्री प्राप्त होती है, जबकि मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों से सामान्य दिनों में दो टन सामग्री एकत्र की जाती है।
3. सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मोड में संचालित इस संयंत्र की प्रसंस्करण क्षमता प्रतिदिन तीन टन है और यह निगम के लिए लगभग 5,000 रुपये मासिक राजस्व उत्पन्न करता है।
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यह हो रहा फायाद
- जल और वायु प्रदूषण में कमी।
- शहर की स्वच्छता में सुधार।
- आजीविका के नए अवसरों का सृजन।
- धार्मिक अपशिष्ट प्रबंधन के 'शून्य अपशिष्ट' मॉडल की ओर एक व्यावहारिक कदम।