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सिंहस्थ मेले के बाद चली जाएगी शिवराज की कुर्सी?

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मध्यप्रदेश के उज्जैन में दो माह बाद अप्रैल में आयोजित होने वाले सिंहस्थ कुंभ से जुड़े एक मिथक ने सियासी तौर पर खासी हलचल और बहस पैदा कर रखी है। मिथक यह है कि जब सिंहस्थ आता है तो राज्य का मुख्यमंत्री बदल जाता है या उसे कुर्सी छोड़नी पड़ती है।
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60 साल पहले बने इस सूबे में पांच सिंहस्थ हुए हैं और संयोग से हर बार सिटिंग चीफ मिनिस्टर को पद छोड़ना पड़ा। चाहे वे कांग्रेस सरकारों के रहे हों अथवा भाजपा के, सिंहस्थ पूरी सरकार ले लेता है या फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी! क्या इस बार भी ऐसा ही होगा? शिवराज सिंह चौहान रहेंगे या जाएंगे?

जहां तक मौजूदा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का सवाल है, अधिकारिक तौर पर वह सिंहस्थ की तैयारियों पर अपना ध्यान फोकस किए हुए हैं और इस प्राचीन मिथक के बारे में अब तक उनकी कोई टिप्पणी सामने नहीं आई है। अंदरखाने से ये खबरें जरूर हैं कि मिथक को ग़लत साबित करने के लिए धार्मिक अनुष्ठान और पूजा पाठ काफी पहले से किए जा रहे हैं।
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हो जाता है सत्ता का परिवर्तन

कोई छह माह पूर्व शाजापुर के नलखेड़ा में दो ट्रक हवन सामग्री पहुंचाई गई थी। नलखेड़ा में बगुलामुखी का सिद्ध स्थान है। शिवराज के परिवार के सदस्य वहां गए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक भाई और केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति इरानी भी पिछले दिनों वहां पहुंचे थे।

चूंकि सरकार भाजपा की है और कांग्रेस विपक्ष में है, सो मिथक को लेकर मान्यताएं भी बदल गई हैं। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी कहते हैं, "मिथक तो चलते रहते हैं, इनमें कोई दम नहीं रहता। एक बार किसी के यहां शादी थी। घर में बिल्ली आई तो उस पर बांस की डलिया डाल दी गई। शादी निर्विघ्न संपन्न हो गई।

अगली बार फिर मौका आया तो सवाल हुआ कि कोई रिवाज पूरा तो नहीं करना! जवाब मिला-बस बिल्ली पर डलिया डालना है।" लेकिन कांग्रेस के प्रवक्ता केके मिश्रा ने बीबीसी से कहा, "यह मिथक हमारे इतिहास, अध्यात्म, शास्त्रों और ग्रंथों पर आधारित है तो इसे नकारा नहीं जा सकता। कांग्रेस की सरकारें भी इसका शिकार हुई हैं।
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ग्रहों की चाल है जिम्मेदार?

ग्रहों की चालों को तंत्र-मंत्र के माध्यम से शिथिल तो किया जा सकता है, लेकिन समाप्त नहीं किया जा सकता।" अप्रैल मई 2004 का सिंहस्थ - दिग्विजय सिंह ने बतौर मुख्यमंत्री इसकी तैयारी शुरू करवाई। लेकिन चुनाव में कांग्रेस की सरकार चली गई।

उमा भारती के हाथ में सत्ता आ गई। उमा ने बाद में अपने मुख्यमंत्रित्व काल में सिंहस्थ संपन्न कराया और अगस्त में उन्हें अचानक कुर्सी छोड़नी पड़ी। 1992 का सिंहस्थ - सुंदरलाल पटवा सीएम थे। सिंहस्थ पूरा कराने के छह माह बाद ही उनकी तो पूरी सरकार बर्खास्त कर दी गई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।

1980 का सिंहस्थ - जनता पार्टी की सरकार में सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री थे। एक माह भी नहीं टिक पाए और उनकी सरकार चली गई। इसके पहले भी जो दो कुंभ हुए उनमें तत्कालीन मुख्यमंत्रियों को किसी न किसी कारण से अपना पद गंवाना पड़ा।
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