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कई मायने में अलग है योगी 2.0 की सरकार: पूर्व राज्यपाल, पूर्व आईएएस व आईपीएस भी मंत्रिमंडल का हिस्सा

Sat, 26 Mar 2022 11:15 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव महेंद्र तिवारी, अमर उजाला, लखनऊ

सार

योगी 2.0 की सरकार में पुराने मंत्रियों की छंटनी की गई। नए मंत्रियों के चयन और काम के नतीजे पर खास ध्यान दिया गया है। मंत्रिमंडल में पूर्व राज्यपाल, पूर्व आईएएस व आईपीएस अधिकारियों को भी जगह दी गई है।
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कैबिनेट मंत्री पद की शपथ लेतीं बेबी रानी मौर्य व अरविंद कुमार शर्मा। - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने शुक्रवार को दोबारा सत्ता संभाल ली। यह सरकार साढ़े तीन दशक बाद लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी के नजरिए से ही अलग नहीं है बल्कि यह सरकार नए मंत्रियों के चयन, कद्दावर पुराने मंत्रियों की छंटनी और नई सरकार के लिए बड़े लक्ष्यों का एलान के लिहाज से भी अलग है। इन लक्ष्यों के आधार पर ही इस सरकार का आगे आकलन होगा।

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योगी 1.0 वरिष्ठ व युवा चेहरों के सरकार में समन्वित भागीदारी की कोशिश तक सीमित थी। काम की कसौटी पर कुछ ही खरे साबित हुए। बड़े कद व अहम विभाग वाले कई मंत्रियों का कोई आउटपुट नजर नहीं आया तो कई की अनुभवहीनता ही पूरे समय नजर आई। कई अपने आचार-व्यवहार से सरकार की मुश्किलें बढ़ाते रहे। तो कई मंत्री बनने के बाद अपनी छवि चमकाने पर ही ज्यादा ध्यान दे रहे थे। इसके लिए संगठन व नेतृत्व को नजरंदाज तक कर रहे थे। नतीजा ये हुआ कि कुछ की संगठन ने विधानसभा चुनाव में टिकट के समय विदाई की। कई किसी वजह से टिकट पाए तो जनता ने विदाई कर दी। कुछ बेहतर समीकरण व लहर की वजह से जीत गए तो उन्हें नई सरकार में मौका न देकर बड़ा संदेश दिया गया है।

योगी की नई कैबिनेट कड़ी सर्जरी के बाद तैयार की गई है। इसके गठन में पिछले पांच वर्ष के कामकाज के अनुभवों के आधार पर कमियों को दूर करने के साथ हर समीकरण को साधने की कोशिश नजर आ रही है। नई कैबिनेट में सूर्य प्रताप शाही, सुरेश खन्ना, धर्मपाल सिंह व लक्ष्मी नारायण चौधरी जैसे वरिष्ठ सदस्यों के अनुभव को महत्व दिया गया है, तो नए व युवा चेहरों के चयन में रिजल्ट के नजरिए को ध्यान में रखा गया है।
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बेबीरानी मौर्य पूर्व राज्यपाल रही हैं तो प्रधानमंत्री कार्यालय सहित कई मंत्रालयों में कामकाज का अनुभव रखने वाले नौकरशाह से राजनीतिज्ञ बने एके शर्मा को नई कैबिनेट का हिस्सा बनाया गया है। इसी तरह एडीजी स्तर के आईपीएस अधिकारी से राजनीतिज्ञ बने असीम अरुण को राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया है। सहयोगी दलों में अपना दल (एस) से आशीष पटेल भी मंत्रिमंडल का हिस्सा हैं। आशीष इंजीनियर हैं।

उप मुख्यमंत्री चयन में सामाजिक समीकरण मजबूत करने पर जोर
पिछली सरकार में भी दो उप मुख्यमंत्री थे। प्रदेश में पिछड़ा वर्ग के बड़े चेहरे के रूप में स्थापित केशव प्रसाद मौर्य का महत्व बनाए रखा गया है। केशव चुनाव हारने के बावजूद दोबारा उप मुख्यमंत्री बनाए गए हैं। इसी तरह ब्राह्मण समाज से योगी 1.0 में उप मुख्यमंत्री के पद पर रहे डॉ. दिनेश शर्मा की जगह समय-समय पर मुखर होकर बात करने वाले ब्रजेश पाठक को ब्राह्मण चेहरे के तौर पर उभारा गया है। योगी 1.0 में ब्राह्मणों से जुड़े मुद्दे पर जब भी डैमेज कंट्रोल की नौबत आई, सरकार व संगठन ने पाठक को आगे कर भरपूर उपयोग किया था।

लक्ष्य के नजरिए से भी अलग
मुख्यमंत्री योगी ने विधानमंडल दल के चयन के बाद अपने दूसरे कार्यकाल के लिए कठिन लक्ष्य का एलान किया है। उन्होंने कहा है कि पहले कार्यकाल में कुशासन से सुशासन स्थापित करने के लिए प्रतिस्पर्धा थी। अब सुशासन को मजबूत करने की प्रतिस्पर्धा होगी। वास्तव में यह बेहद कठिन लक्ष्य है। इसके लिए पूरी सरकार व शासन को टीम भावना के साथ गवर्नेंस से कानून-व्यवस्था तक के मोर्चे पर मिलकर काम करना होगा। मंत्रिमंडल के गठन में इस पर ध्यान दिए जाने की कोशिश नजर आ रही है।

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योगी 2.0 के सामने चुनौतियां भी कई

-17वीं विधानसभा में चुने गए प्रदेश सरकार के कई मंत्री और विधायक चुनाव हार गए। 18वीं विधानसभा में भाजपा व उसके गठबंधन के सदस्यों की संख्या भी कम हुई है। तमाम विधायक बहुत कम वोटों के अंतर से चुनाव जीते हैं। इससे लोकसभा चुनाव की चुनौतियां बढ़ गई हैं। दो साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव योगी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक  चुनौती है। 

-सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लोकसभा से इस्तीफा देकर राज्य की राजनीति में पूरा समय देने का संकेत किया है। उनके वरिष्ठ सहयोगी व पूर्व मंत्री आजम खां ने भी लोकसभा से इस्तीफा देकर उनके हमराह होने का संदेश दिया है। पिछली बार से ढाई गुना अधिक सीटें जीतने के बाद अखिलेश यादव का आत्मविश्वास बढ़ा है। राज्य की राजनीति में पूर्ण सक्रियता का उनका फैसला इसका संकेत है। माना जा रहा है कि सपा संगठन की मजबूती व यादव-मुस्लिम गठजोड़ से इतर समाज को जोड़ने पर फोकस बढ़ाएगी। दूसरा, मजबूत विपक्ष होने से सदन की चुनौती भी बढ़ेगी। योगी सरकार को इस राजनीतिक चुनौती का भी सामना करना होगा।

- योगी 1.0 में मंत्रियों द्वारा पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की शिकायतें आम थीं। चुनाव में संगठन को इन शिकायतों से दो-चार होना पड़ा। तमाम जगह कार्यकर्ताओं को मनाने के लिए संगठन व संघ को बड़ी कोशिश करनी पड़ी। योगी 2.0 में ऐसी स्थिति न बने, इस पर ध्यान देना होगा। हालांकि आम कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करने वाले अधिकतम मंत्रियों को ड्रॉप कर इसका संकेत दे दिया गया है। 

- प्रदेश में तेजी से बदलाव महसूस हो, इसके लिए एक थिंकटैंक की जरूरत है। इसके लिए केंद्र सरकार की तर्ज पर राज्य नीति आयोग का गठन होना था। योगी 1.0 में कई बार इसकी घोषणा हुई, लेकिन इसका गठन नहीं हो सका। योगी 2.0 में राज्य नीति आयोग का गठन व उसकी बेहतर उपयोगिता सुनिश्चित करनी होगी। बदलाव को तेजी से बढ़ाने में इससे मदद मिल सकेगी।

- प्रदेश सरकार ने 2022 से 2027 तक पांच वर्षों में प्रदेश को 10 खरब डालर अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य तय किया है। मौजूदा परिस्थितियों में यह लक्ष्य आसान नहीं है। कोरोना महामारी की वजह से इस लक्ष्य को आगे बढ़ाना पड़ा है। सरकार अगर यह उपलब्धि हासिल कर पाती है तो प्रदेश की तरक्की देखने वाली होगी।

- ब्यूरोक्रेसी में रिजल्ट देने वाले वरिष्ठ अफसरों की संख्या तेजी से कम हुई है। इस वर्ष के अंत तक कई और वरिष्ठ अधिकारी रिटायर हो जाएंगे। योगी 1.0 में महत्वपूर्ण पदों पर रहे कई अच्छे अधिकारी अपने कॅरियर के मद्देनजर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाना चाहते हैं। ऐसे में अच्छे छवि वाले अधिकारियों को राज्य में रोकना और औसत छवि वाले अधिकारियों पर निगहबानी के साथ नतीजे वाले काम सुनिश्चित करना किसी चुनौती से कम नहीं है।

- विधानसभा चुनाव में छुट्टा गौवंश से किसानों के नुकसान, बेरोजगारी व भर्तियों में तमाम तरह की शिकायतें के अलावा महंगाई की समस्या बड़े मुद्दे के रूप में सामने आए हैं। इन चुनौतियों का तेजी से समाधान सुनिश्चित कर युवाओं को जोड़े रखना बहुत अहम होगा।
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