फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

खुद पढ़ने के बाद आप दूसरों को भी सुनाना चाहेंगे इनकी कहानी

Thu, 03 Mar 2016 05:11 PM IST
रोली खन्ना/अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
विज्ञापन
छोटी-छोटी कोशिशों से समाज में एक दिन बड़ा बदलाव आना तय है। कुछ ऐसी ही सोच है लाइमलाइट से दूर रहने वाले अनाम किरदारों की। उनकी स्पष्ट सोच है कि उन्हें अपने परिवार, अपने कॅरिअर से इतर समाज के लिए कुछ करना है। उनका यकीन क्रांतिकारी बदलावों में नहीं, क्योंकि इनकी उम्र लंबी नहीं होती।
विज्ञापन


यही वजह है कि वे अपने स्तर से जितना भी संभव है, छोटे-छोटे बदलावों व सुधारों के लिए जुटी रहती हैं। इनमें कुछ स्टूडेंट्स हैं, तो कुछ कामकाजी महिलाएं। कुछ गृहणियां भी हैं। अखबारों की सुर्खियों से दूर ये किरदार सिर्फ और सिर्फ अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को निभाते चले जा रहे हैं... इन्हीं अनाम किरदारों को सामने ला रही हैं रोली खन्ना...

स्पेशल बच्चों की स्पेशल मां स्वाति शर्मा प्रिंसिपल, आशा ज्योति स्कूल

किसी भी महिला के लिए पहली बार मां बनना एक अलग अहसास होता है, हर पल स्फूर्ति देता है और बच्चे का पूरा भविष्य सपनों में ही आकार लेने लगता है, लेकिन यदि पहली ही संतान एक लाइलाज बीमारी के साथ पैदा हो तो मजबूत से मजबूत इंसान भी टूट जाता है।
 
पर, स्वाति शर्मा नहीं टूटीं। आशा ज्योति स्कूल की प्रिंसिपल स्वाति शर्मा के बेटे अंतरिक्ष के दिल और तालू में छेद था। ब्रेन डैमेज हो चुका था। अंतरिक्ष साढ़े पांच साल का हुआ तो वह उसे लेकर आशा ज्योति स्कूल पहुंची और दाखिला कर दिया।

बेटे के कारण वे हर रोज वहां जाती थीं। उस समय मोहिनी पंत प्रिंसिपल हुआ करती थीं। उन्हीं की प्रेरणा से वे वहां वॉलेंटरी सर्विस देने लगीं। धीरे-धीरे यह जुड़ाव बढ़ता गया और अपने बेटे के साथ-साथ वहां रहने वाले हर स्पेशल चाइल्ड की विशेष मां बन गईं। उनकी निष्ठा देख मोहिनी पंत ने उन्हें स्कूल के हर कार्यक्रम में शामिल करना शुरू कर दिया।

2006 में जब मोहिनी पंत का निधन हो गया तो स्वाति को प्रिंसिपल बना दिया गया। कभी पढ़ाई छोड़ चुकीं स्वाति अब ऑटिज्म में डिप्लोमा कर रही हैं। शायद ईश्वर का कोई संदेश है यह कंजीनाइटल एबनॉर्मेलिटीज लाखों बच्चों में से किसी एक होती है।

बेटे अंतरिक्ष का ब्रेन ऑक्सीजन की कमी से डैमेज हो चुका था। पैर भी छोटा-बड़ा था और हड्डियों की बीमारी भी थी। कहती हैं कि अंतरिक्ष की मां बनाकर ईश्वर ने शायद उन्हें एक संदेश दिया था और यही वजह है कि वे आशा ज्योति से जुड़ी हैं। कहती हैं कि इन बच्चों का आईक्यू लेवल कम है, लेकिन इन्हें प्यार की दरकार है।

अंग्रेजी में सिखाती हैं मंत्रोच्चार: निष्ठा रस्तोगी शिक्षिका

क्या आप कल्पना भी कर सकते हैं कि शहर के कुछ बच्चे अंग्रेजी में मंत्रोच्चारण करते हुए हवन करना सीख रहे हैं। यह चौंकाने वाली बात तो है, पर सच है। यह संभव हो रहा है एक स्कूल में टीचर निष्ठा रस्तोगी के प्रयासों से।

बाल संस्कार शाला की संचालिका निष्ठा सात घंटे स्कूल, कुछ घंटे घर-परिवार को संभालने में और बाकी का सारा समय बच्चों को संस्कार और आधुनिकता में तालमेल का पाठ पढ़ाने में जाता है। इसके अलावा वे युवाओं को पर्यावरण के प्रति जागरूक करती हैं, नेत्रदान के लिए लोगों को प्रेरित करती हैं और रक्तदान शिविरों में बढ़ चढ़कर मौजूदगी दर्ज कराती हैं।

वे यह सब वह इसलिए करती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि समाज के प्रति उनकी भी कोई जिम्मेदारी है। हालांकि वे कहती हैं कि गायत्री परिवार से जुडऩे के बाद उन्हें यह सब करने की प्रेरणा मिली।

निष्ठा कहती हैं कि भागती-दौड़ती जिंदगी में संस्कार से दूर होते जा रहे हैं हमारे बच्चे। यह प्रवृत्त्ति हमारी जड़ों को कमजोर कर देगी। कानपुर रोड एलडीए कॉलोनी में उनके नेतृत्व में तीन टीमें काम कर रही हैं।


निष्ठा कहती हैं कि हमारी संस्कारण शाला में कॉन्वेंट स्कूलों के पढ़े बच्चे आते हैं। उनका जुड़ाव अंग्रेजी से ज्यादा होता है और हिंदी से कम। खैर, यह तो वक्त की मांग है।

हमने उन्हें परंपराओं और संस्कारों के करीब रखने का यह तरीका ढूंढा कि अंग्रेजी में भी मंत्रोच्चारण और यज्ञ-हवन कराने की परंपरा शुरू की। निष्ठा अब तक पांच लोगों का मरणोपरांत नेत्रदान करा चुकी हैं।

गरीब बच्चों बुलाते हैं कम्प्यूटरवाली दीदी: परीवश फातिमा

एक दिन घर में काम करने वाली के बच्चों ने कम्प्यूटर की ओर इशारा करते हुए पूछा यह क्या है? यह कैसे चलता है? छोटे बच्चों की जिज्ञासा और स्कूल ना जाने पाने की उनकी विवशता ने परीवश फातिमा को अंदर तक झकझोर कर रख दिया।

उन्होंने घर के कोने में पड़े कम्प्यूटर को निकाला और उन बच्चों को सिखाना शुरू कर दिया। बस यहीं से उन्होंने एक नेक काम शुरुआत करने की ठानी। आसपास के घरों और मोहल्ले के उन बच्चों को, जो कम्प्यूटर क्लास नहीं जा सकते, उनसे धीरे-धीरे संपर्क कर बुलाना शुरू कर दिया और बन गई सबकी कम्प्यूटरवाली दीदी।

यह वही कंप्यूटरवाली दीदी है, जिसे एलयू में चांसलर सिल्वर मेडल मिला था। यह मेडल पढ़ाई के साथ-साथ सामाजिक कार्य में स्टूडेंट के योगदान के लिए दिया जाता है।

परी कहती हैं कि धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढऩे लगी और तीन बैच चलने लगे। इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए पैसा चाहिए था, पॉकेट मनी से जो बन पड़ता कर लेती थी। इस काम में मेरी बहन ने आर्थिक मदद दी। परीवश प्रोफेसर बनना चाहती हैं, क्योंकि उनका मानना है कि खुद कुछ बनने के बाद ही मैं औरों के लिए कुछ कर पाऊंगी।

बुंदेखंड के किसानों के हक में खड़ी हुईं: प्रीति चौधरी फैकल्टी, बीबीएयू

कुछ समय पहले एक महिला ने बुंदेलखंड के किसानों को आर्थिक मदद मुहैया कराने के लिए एक मुहिम शुरू की। पहल खुद से की और अपने वेतन से एक लाख रुपये किसानों के लिए दे दिया।

इसके बाद सोशल मीडिया और व्यक्तिगत संपर्क के आधार पर अपने दोस्तों से आर्थिक मदद मांगी और करीब 53 लाख रुपये जुटा लिए। यह एक छोटी सी कोशिश है बीबीएयू में फैकल्टी प्रीति चौधरी की। कहती हैं कि हम नीति निर्माण का हिस्सा नहीं हो सकते, लेकिन अपने प्रयासों से जरूरतमंद लोगों को मदद मुहैया करा सकते हैं।

प्रीति कहती हैं कि हमने किसी भी किसान के हाथ में पैसा नहीं दिया बल्कि घर की महिला सदस्य के नाम एफडी कराई। हालांकि रकम पर मिलने वाला ब्याज बहुत कम था, लेकिन जिस इलाके में खाने को दाना भर नहीं, वहां थोड़ी भी मदद बहुत बड़ा सहारा बन सकती है।

दिव्यांगों का कॅरिअर मजबूत बनाने की जिद: वर्षा सिंह, शोध छात्रा

आज जब युवा पढ़ लिख कर बेहतर पैकेज की चाह में कॅरिअर के अलग-अलग विकल्प चुन रहे हैं, वहीं वर्षा ने चुनी दूसरों की मदद करने की राह। बी-कॉम करते-करते ही तय कर लिया कि उन्हें दिव्यांग और समाज के उस तबके के लिए कुछ करना है, जिसे सीमांत कहा जाता है। बस शुरू हो गया सफर।

समाजशास्त्र से एमए करने के साथ-साथ वे नुक्कड़ नाटकोंं के जरिए जागरूकता का प्रचार-प्रसार करने लगीं। इस दौरान वे कुछ ऐसे दिव्यांगों के संपर्क में आईं, जिन्हें उनकी कमी की वजह से नौकरी मिलने में दिक्कत आ रही थी।

तब उन्होंने दिव्यांगों की काउंसलिंग की, पर्सनॉलिटी डवलपमेंट की ट्रेनिंग दी। आखिरकार उनका हौसला बढ़ा और उनका प्लेसमेंट हो सका। छोटी सी कोशिश से मिली इस सफलता ने उनके आत्मविश्वास को बढ़ा दिया।

वर्षा बताती हैं कि उन्होंने आर्थोपेडिकली हैंडीकैप्ड ट्रेनर का प्रशिक्षण लिया। इसके बाद उन्हें विकलांगोंं की मानसिकता समझने में आसानी हुई। ऐसे जरूरतमंद दिव्यांगों को उठने-बैठने के तरीके सिखाने के साथ-साथ जरूरतभर की अंग्रेजी भी सिखाती हैं। वे एक संस्था से भी जुड़ी हैं, जो दिव्यांगों के प्लेसमेंट के लिए काम करती हैं।

देख-बोल नहीं सकते, उन्हें बना रहीं जूडो उस्ताद

कुछ साल पहले उनके पति विदेश दौरे से लौटे। बताया कि विदेश में नेत्रहीन और मूकबधिर बच्चों को किस तरह जूडो का बेहतरीन प्लेयर बनाया जा रहा है। यह बात आयशा मुनव्वर के मन में भी कहीं बैठ गई। उन्होंने तय कर लिया कि वे अपने देश में भी नेत्रहीन और मूकबधिर बच्चों को ट्रेंड करेंगी।

उन्हें उनके वजूद के साथ जीना सिखाएंगी। एक संकल्प के साथ शुरू हुआ आयशा का यह सफर आज तक जारी है। खास बात है कि उनकी संस्था सिर्फ लखनऊ ही नहीं बल्कि प्रदेश के कई शहरों में करीब 400 बच्चों को जूडो की नि:शुल्क ट्रेनिंग दे रही है।

आज उनके ट्रेंड किए बच्चे झुग्गी-झोपडिय़ों से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। ब्लैक बेल्ट आयशा कहती हैं कि जब हमने बच्चों को सिखाना शुरू किया तो लोग कहते थे कि जरूर पैसे की लालच में ये काम कर रहे हैं। खैर, हमें तो इन बच्चों का भविष्य संवारना है। इनसे कोई फीस नहीं ली जाती। हां, हमारे काम को देख अब हमें सबका समर्थन मिलने लगा है।
विज्ञापन

स्लम के बच्चों में जगा रहीं श‌िक्षा की अलख: गीता सिंह

कुछ साल पहले जानकीपुरम में एक पेड़ के नीचे झुग्गी-झोपडिय़ों के चंद बच्चों को एक महिला ने पढ़ाना शुरू किया था। आज वहां पक्की छत के नीचे दो-तीन कमरों में करीब 75 बच्चे रोजाना पढऩे आते हैं।

ये सभी घरों में काम करने वाले बच्चे हैं, इसलिए इनके आने का समय तय नहीं लेकिन छुट्टी 2.30 बजे के करीब होती है। खास बात है कि इन्हें कॉपी-किताब और नाश्ता फ्री मिलता है।

यह सब संभव हुआ गीता सिंह के प्रयासों से। आर्थिक रूप से कमजोन इन बच्चों को यहां पढ़ाई के साथ-साथ इतर गतिविधियों के लिए तैयार करने के लिए वर्कशॉप्स वगैरह भी कराई जाती है।

इस स्कूल में झुग्गी-झोपड़ी के अब तक 700 बच्चों को मेनस्ट्रीम में लाने के लिए तैयार किया जा चुका है। स्कूल का सिलेबस इस प्रकार का है कि बच्चों को क्लास 3 तक की पढ़ाई कराई जाती है।

उसके बाद प्रयास शुरू होते हैं किसी रजिस्टर्ड स्कूल में दाखिला कराने के लिए। गीता कहती हैं कि दाखिले के बाद फीस भरना एक बड़ी चुनौती होती है। इसके लिए वह अपने जानने वालों से संपर्क कर उन्हें एक-एक बच्चों की फीस भरने के लिए प्रेरित कर तैयार करती हैं।

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें