भातखंडे संस्कृति विवि में प्रशिक्षण लेते प्रशिक्षु। स्रोत ः विवि
लखनऊ। हमारे देश की बहुत सी ऐसी कलाएं हैं जो धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। जिन विधाओं की खुशबू से कभी पूरा देश महकता था वह अब गुम होती जा रही है। इनमें सतारा, पखावज और सारंगी मुख्य है। इन्हें बचाने के लिए भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय में कला अभिरुचि कार्यशाला चलाई जा रही है। देश की संस्कृति को सहेजने में महिलाएं पहले पंक्ति में खड़ी नजर आ रही हैं। लोकनृत्य, भारत नाट्यम, ढोल वादन, शास्त्रीय गायन, पखावज आदि भारतीय विधा को महिलाएं सहेजने में लगी हैं। इन कार्यशालाओं में 84 प्रतिशत महिलाएं प्रशिक्षण ले रही हैं। इनमें पांच से दस साल की बच्चियां, युवतियां और 75 साल तक की महिलाएं शामिल हैं। इनका कहना है कि वे भारतीय संस्कृति को सहेजकर उसकी खुशबू पूरी दुनिया में फैलाना चाहती हैं।
कथक नृत्य प्रशिक्षिका एकता मिश्रा का कहना है कि कथक की कार्यशाला में कई ऐसी प्रतिभाएं है जो इस विधा को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगी। मुझे खुशी है कि महिलाएं घर की जिम्मेदारी उठाने के साथ हमारी विरासत को सहेजने में बढ़चढ़ कर आगे आ रही हैं। इन्हीं में से कई सारी प्रशिक्षुओं के घुंघरुओं की झंकार एक दिन विश्वभर में गूंजेगी।
प्रशिक्षु गीता का कहना है कि पखावज मृदंग को वापस दिलानी है खोई पहचान प्रचीन काल में शादी समारोह की रौनक रहने वाले पखावज मृदंग को उसकी खोई हुई पहचान वापस दिलाने के लिए मैं इस विधा को सीख रही हूं। साथ ही, मैंने दो अन्य महिलाओं को भी इससे जोड़ा है।
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युवा पीढ़ी को देश की संस्कृति से कराना है रूबरू
प्रशिक्षु मुदिता सिंह के अनुसार सपना है कि हमारे देश की संस्कृति की खूबसूरती से युवा पीढ़ी को रूबरू कराना। हमारी नई पीढ़ी पश्चमी सभ्यता की तरफ तेजी से आकर्षित हो रही है। ऐसे में मैं भारत नाट्यम और शास्त्रीय गायन आदि प्रशिक्षण लेकर अपने बच्चों को इसकी खासियत बताना चाहती हूं।
संस्कृति से जुड़ाव महसूस करने के लिए सीख रही लोकनृत्य
प्रशिक्षु रागिनी अग्रवाल ने बताया कि कोई भी कला सीखने की कोई निश्चित उम्र नहीं होती। मेरी उम्र 63 साल है और मैं लोकनृत्य सीख रही हूं क्योंकि इस तरह से मैं देश की संस्कृति से जुड़ाव महसूस करती हूं।