शीर्ष न्यायालय द्वारा सॉफ्ट ड्रिंक्स की गुणवत्ता जांचने की नियमित कार्रवाई का दिशा निर्देश एफएसडीए प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
बिना संसाधन व प्रवर्तन टीम के मिलावटखोरी के धंधे में शामिल लोगों की धरपकड़ बस कागजी दावों तक ही सिमट कर रह गई है।
खाद्य सुरक्षा व औषधि प्रशासन से जुड़े जिम्मेदार अधिकारी भी परोक्ष तौर पर मानते हैं कि गठन के बाद से आम लोगों की सेहत की निगरानी को गठित यह विभाग शासन की उपेक्षा झेल रहा है।
दो साल बाद भी मिलावटखोरों के खिलाफ ठोस कार्रवाई के लिए अपना स्थायी प्रवर्तन दस्ता तक नहीं है। पर्याप्त बजट का न होना भी मिलावटखोरी की रोकथाम में बड़ी बाधा बना है।
अभियान के दौरान संकलित नमूनों की जांच के लिए प्रादेशिक जन विश्लेषण प्रयोगशालाओं के पास जरूरी केमिकल व अन्य संसाधनों का भी टोटा है।
लखनऊ,वाराणसी,आगरा, बरेली व मेरठ स्थित पांचों प्रादेशिक लैंबों में पर्याप्त संसाधन न होने के कारण नमूना जांच की रिपोर्ट आने में दो से तीन माह का समय लगता है।
कुछ माह पूर्व एक प्रमुख कंपनी की कोल्ड ड्रिंक्स में खतरनाक बेन्जीन की गंभीर शिकायत के बाद भी प्रयोगशाला में इसकी पुष्टि न हो सकी।
लैब द्वारा जारी रिपोर्ट में साफ लिखा है कि संसाधनों के अभाव में कोलड्रिंक्स में बेन्जीन पुष्टि की जांच लैब स्तर पर संभव नहीं हो सकती।
एक प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनी की कोल्ड ड्रिंक्स के चिनहट स्थित फैजाबाद रोड पर बने बॉटलिंग प्लांट में सॉफ्ट ड्रिंक्स का तैयार स्टाक धूप में रखे जाने से बोतल में बंद पेय में खतरनाक बेन्जीन की आशंका के बाद ही उक्त सैंपलिंग हुई थी।
बीते मई माह में हुई इस कार्रवाई की तीन माह बाद जारी प्रयोगशाला रिपोर्ट में उत्पाद की गुणवत्ता छोड़ बस पैकेजिंग एक्ट के तहत सॉफ्ट ड्रिंक्स बोतल के बाहर दर्ज सूचनाओं को प्रकाशित करने में उजागर खामी को ही दर्शाया गया था।
एफएसडीए की जिला इकाई द्वारा इस पूरे साल में सॉफ्ट ड्रिंक्स की जांच के लिए बस दो बड़ी कार्रवाई हुई है।
दोनों ही कार्रवाई में संकलित दो प्रमुख कंपनियों के अलग-अलग ब्रांड की सॉफ्ट ड्रिक्स नमूनों की जांच रिपोर्ट में सेफ श्रेणी के तहत सिर्फ पैकेजिंग एक्ट की अनदेखी को ही गड़बड़ी के बतौर दर्शाया गया।
ब्रांडेड बोतल में केमिकल युक्त रंगीन पानी
मोटी कमाई की खातिर शहर में ब्रांडेड कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलों में मीठा जहर बने केमिकल युक्त रंगीन पानी को भी लोकल सॉफ्ट ड्रिक्स बता बेचा जाता है। इसमें मुख्य तौर पर घातक स्क्रीन व सिक्रेट एसिड का इस्तेमाल होता है।
ऐसी सॉफ्ट ड्रिंक्स को एक बड़े टब में पानी व केमिकल युक्त लिक्विड डाल कर अलग-अलग फ्लेवर का घोल तैयार कर सोडा पैकिंग मशीन के माध्यम से ब्रांडेड कंपनियों अथवा उससे मिलते-जुलते नाम व रैपर वाली बोतलों में भर कर बिल्कुल असली कोल्ड ड्रिंक्स का लुक देकर बाजार में खपाया जाता है।
इस धंधे में मात्र बोतल खरीद पर आने वाली दो से तीन रुपया लागत पर चार से पांच गुना मुनाफा होता है। रेलवे व बस स्टेशन इस नकली सॉफ्ट ड्रिक्स को खपाने के मुफीद होते हैं।
दो साल से प्रवर्तन दस्ता तक नहीं
एफएसडीए में छापामार कार्रवाई के लिए अधिकृत अपर आयुक्त प्रवर्तन का पद तो है लेकिन बीते दो साल से किसी की तैनाती की राह देख रहा है।
डीआईजी पुलिस स्तरीय इस पद पर किसी भी अधिकारी की तैनाती न हो पाने से ही मिलावटखोरों के खिलाफ विभागीय स्तर पर ठोस कार्रवाई संभव नहीं हो पाती।
एफएसडीए एक्ट के तहत मिलावटी खाद्य सामग्री बेचने वालों के खिलाफ कार्रवाई के लिए अपर आयुक्त प्रवर्तन के स्तर से स्थायी दस्ता गठित कर छापेमारी का प्रावधान है।
इस टॉस्क फोर्स में एसपी,पुलिस इस्पेक्टर,चीफ फुड संरक्षा अधिकारी,खाद्य सुरक्षा अधिकारी व ड्रग इस्पेक्टर को शामिल किए जाने की अनिवार्यता है।
ड्राई फ्रूट में भी घटिया सप्लाई
दीपावली पर मिठाई से ज्यादा पसंद किए जाने वाले ड्राई फ्रूट की सप्लाई में भी धंधेबाजों ने सेंध लगा ली है।
इसके चलते ही साफ सुंदर सी आकर्षक पैकिंग में काजू बादाम के नाम पर पॉलिश किए गए घटिया क्वालिटी के ड्राई फ्रूट पैक कर बाजार में खपाए जा रहे हैं।
धंधेबाज मोटा मुनाफा कमाने के लिए सस्ती दर पर घटिया ड्राई फ्रूट मंगवा कर उसे बाहर से गुणवत्तायुक्त दिखने लायक बनाते हुए गिफ्ट पैकिंग में भर ‘हैप्पी दीपावली’ कह रहे हैं।