आखिरकार अमेठी में वही हुआ जिसका चुनाव प्रचार के दौरान अंदेशा जताया जा रहा था। राहुल गांधी को अमेठी में जीत हासिल हुई लेकिन उसका मार्जिन काफी घट गया।
हालत यह है कि कांग्रेसी भी यह नहीं समझ पा रहे कि इस जीत पर वे जश्न मनाएं या नहीं।
उनके चेहरे की बनावटी मुस्कुराहट दिल की पीड़ा बयां कर रही है।
नतीजे ने क्षेत्र के उन दिग्गज कांग्रेसियों के दावों की हवा निकाल दी है जो राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा से सब कुछ ठीक होने का दावा कर रहे थे।
स्मृति को देर से भेजा
भाजपाई भी इस बात को मान रहे हैं कि स्मृति ईरानी को पार्टी ने दो महीने पहले भेज दिया होता तो नतीजा बदल जाता।
साढ़े तीन दशक से कांग्रेस के गढ़ के रूप में शुमार अमेठी का किला इस बार ध्वस्त भले ही नहीं हुआ लेकिन दरक जरूर गया।
सोनिया गांधी की क्षेत्र में पहली चुनावी रैली, प्रियंका वाड्रा और राहुल गांधी की लगातार सक्रियता भी पुराने नतीजे को बरकरार नहीं रख सकी।
राहुल गांधी को चुनाव में जीत तो मिली लेकिन मार्जिन काफी कम हो गया। ऐसा नहीं कि ये नतीजे अप्रत्याशित हैं।
पहले से ही था अनुमान
इसका अंदाजा चुनाव के दौरान ही लगाया जा रहा था। इसकी वजहें अनायास नहीं थीं। विकास के मुद्दे को लेकर लोगों में राहुल गांधी से नाराजगी थी।
‘आप’ के कुमार विश्वास और भाजपा की स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी की अमेठी में जबरदस्त घेराबंदी कर रखी थी। इस नतीजे को कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है।
जाहिर तौर पर कांग्रेस अमेठी के नतीजे की गहन समीक्षा करेगी। राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के निशाने पर वे स्थानीय कांग्रेसी भी होंगे जो लंबे समय से उन्हें अंधेरे में रखते आए हैं। स्मृति ईरानी के बेहतरीन परफार्मेंस पर भाजपाई भी अचंभित हैं।
भाजपाई यह खुले तौर पर स्वीकार कर रहे हैं कि स्मृति ईरानी को अमेठी भेजने में पार्टी ने विलंब किया। अगर उन्हें दो माह पहले भेजा गया होता आज नतीजा कुछ और होता।