आगरा में धर्मांतरण जैसी घटनाएं क्या 2017 में भाजपा के लिए मददगार साबित हो पाएंगी ? हालांकि भाजपा इस प्रकरण से अलग दिख रही है लेकिन उसने इस पर हो-हल्ला मचाने वालों पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगाकर अपना रुख साफ कर दिया है।
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माना जा रहा है कि आरएसएस से जुड़े संगठन, धर्म जागरण और बजरंग दल धर्मांतरण के जरिये माहौल को गरमा रहे हैं। उन्हें लगता है कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे ही यूपी में भाजपा के लिए जमीन तैयार की जा सकती है।
केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में भले ही यूपी की अहम भूमिका रही हो लेकिन विधानसभा चुनाव 2017 में कमल खिलाने की कठिन चुनौती सामने है। संघ और भाजपा नेतृत्व इससे वाकिफ है।
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उनका मानना है कि भाजपा का उद्देश्य तभी पूरा होता है जब चुनाव में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का माहौल बने। मोदी के नेतृत्व और सांप्रदायिक आधार पर वोटों के बंटवारे ने लोकसभा चुनाव में यूपी में भाजपा को ऐतिहासिक कामयाबी दिलाई। भाजपा को 71 और उसके सहयोगी अपना दल को दो सीटें मिलीं।
मुस्लिम तुष्टीकरण न करें वोटों के सौदागर
विधानसभा चुनाव तक इस माहौल को बनाए रखने के लिए संघ व भाजपा दोनों जुटे हैं। दरअसल, धर्म परिवर्तन शुरू से ही संघ के एजेंडे में है। हिंदू जागरण मंच, धर्म जागरण और बजरंग दल जैसे संगठन इस दिशा में काम कर रहे हैं। अब तक प्राय: ऐसे मामले सामने आते थे, जहां हिंदुओं से ईसाई बनाए गए लोगों का धर्मांतरण किया गया। मुसलमानों को हिंदू बनाने का मामला आगरा में सामने आया है।
भले ही इस मुद्दे पर विवाद की स्थिति बन गई हो लेकिन धर्म जागरण, बजरंग दल और उनका एजेंडा चर्चा में जरूर आ गया है। इन संगठनों का दावा है कि जल्द ही और लोगों का धर्मांतरण कराया जाएगा। यानी इस मुद्दे को गरमाए रखने की तैयारी है।
इस मुद्दे पर भाजपा भी मुखर हो गई है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने आगरा में धर्मांतरण पर हल्ला मचाने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती को आड़े हाथ लिया है।
उन्होंने कहा, नोएडा अथॉरिटी के चीफ इंजीनियर यादव सिंह पर छापे के बाद मायावती, नसीमुद्दीन और स्वामी प्रसाद मौर्य को सांप सूंघ गया था। आगरा में धर्मांतरण मामले की जांच पूरी होने से पहले उनकी बयानबाजी राजनीति से प्रेरित है। वोटों के सौदागर मुस्लिम तुष्टीकरण पर उतर आए हैं।
बसपा को तो जनता ने बोलने लायक नहीं छोड़ा
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष का कहना है कि प्रदेश की जनता ने उन्हें लोकसभा में बोलने लायक नहीं छोड़ा। यही हाल रहा तो उनकी राज्यसभा में बोलने की हैसियत भी नहीं रह जाएगी। उन्होंने कहा, भाजपा का स्टैंड साफ है।
यदि कोई काम संविधान के प्रावधानों के अनुकूल है तो ठीक है। यदि इसके प्रतिकूल है तो अनुचित है। लेकिन, यह बात जांच के बाद ही साफ होगी। इन नेताओं को तुष्टीकरण से बचना चाहिए।
तीखे बयान भी ध्रुवीकरण की कोशिश का हिस्सा ऐसा नहीं है कि सिर्फ धर्मांतरण मुद्दे को ही तूल दिया जा रहा है। कुछ समय पहले नेताओं, मंत्रियों, पूर्व मंत्रियों के विवादित बोल चर्चा में आ चुके हैं। केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति के बयान पर बवाल थमा नहीं था कि पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वामी चिन्मयानंद ने उनके बयान का लगभग समर्थन कर दिया।
उन्होंने साफ कहा कि मोदी सरकार रामजादों की सरकार है लेकिन जो लोग पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बुलाकर अपने बेटे की इमामत कराना चाहते हैं उन्हें क्या कहें? साक्षी महाराज भी पिछले दिनों मुस्लिमों के बारे में विवादित बयान देकर चर्चा में रहे थे।
यूपी में उपचुनाव से पहले प्रदेश भाजपा की बैठक में लव जेहाद का मुद्दा जोर-शोर से उठा था। राजधानी में आरएसएस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई तो संघ नेताओं ने कहा, यह मुद्दा बहुत पहले से उनके एजेंडे में है।
2017 तक और बढ़ेंगे विवाद
आगरा के आरबीएस कॉलेज के राजनीति शास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एसपी कश्यप का कहना है कि संघ परिवार और भाजपा नेता जो कुछ कह या कर रहे हैं, वह अप्रत्याशित नहीं है। धर्मांतरण संघ का प्रमुख मुद्दा है। पहले निशाने पर ईसाई रहते थे और अब मुसलमान हैं।
ईसाइयों के धर्मांतरण से उतना सांप्रदायिक माहौल नहीं बन पाता, इसलिए मुसलमानों को चुना गया है। उनकी कोशिश धर्मांतरण कराने से ज्यादा विवाद खड़ा करने की है।
भाजपा नेताओं के भड़काऊ बयानों को भी वह 2017 की संघ व भाजपा की रणनीति से जोड़कर देखते हैं। उन्हें लगता है कि अगले दो सालों में ऐसे कई और विवाद सामने आएंगे ताकि विधानसभा चुनाव में उसका राजनीतिक लाभ लिया जा सके।
वेस्ट यूपी की राजनीति के जानकार सेवानिवृत्त प्रोफेसर अशोक शास्त्री कहते हैं, भाजपा को लोकसभा चुनाव में 71 सीटें मिली थीं। अब कोशिश है कि पहाड़ पर चढ़ी भाजपा कहीं लुढ़क न जाए। इसीलिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराने की नीयत से विवादित बातें की जा रही हैं।
वह मानते हैं कि सांप्रदायिक आधार पर वोटों का गणित बैठाने की कोशिश स्थायी नहीं होती। संघ के अंतर्विरोधों के चलते धर्मांतरण जैसे मुद्दे उठाए जा रहे हैं। संघ की एक लॉबी को मोदी का गांधीवाद, उदारवाद और गुजरातवाद पसंद नहीं है।
इन्हें ध्वस्त करने के लिए सांप्रदायिक मुद्दों को हवा देने की कोशिश हो रही है। वह मानते हैं कि मोदी के विकास के मुद्दे और पिछड़ों-अगड़ों को जोड़ने के समीकरण से ही भाजपा आगे बढ़ सकती है।