इतिहास गवाह है कि यूपी के साथ केंद्र में भी गैर कांग्रेसियों को सत्ता का स्वाद चखाने में चौधरी चरण सिंह की अहम भूमिका रही थी। वर्ष 1967 में कांग्रेस को तोड़कर वह यूपी के सीएम बने थे। वेस्ट यूपी के सर्वमान्य नेता रहे चौधरी चरण सिंह के पौत्र जयंत चौधरी मौजूदा राजनीति में अपनी पहचान बनाए रखने के लिए समाजवादी पार्टी के साथ अब एक मंच पर आ गए हैं। दोनों पार्टियाें ने चुनावी सभाओं के जरिए एकजुटता तो दिखाई पर एक बड़ा सवाल सामने है कि क्या जयंत चौधरी वेस्ट यूपी में परिवार की चौधराहट को कायम रख पाएंगे?
मंद पड़ने लगी थी अजित सिंह की चौधराहट : चौधरी चरण सिंह की विरासत को उनके पुत्र चौ. अजीत सिंह ने संभाली। कहते हैं विरासत में मिली सियासत लंबे समय तक चौ. अजीत सिंह को सत्ता के गलियारे में आबाद करती रही। हालांकि, जाट समुदाय में उनकी चौधराहट मंद पड़ने लगी थी। बीते लोकसभा चुनावों के बाद अब जो राजनीतिक हालात बने हैं, उसके चलते यह कहा जा रहा है कि कभी वेस्ट यूपी की सियासत का सेंटर रहा चौधरी कुनबा सीटों के लिए दूसरों दल के दरवाजे खटखटाने को मजबूर है। इसके चलते ही अब राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के मुखिया जयंत चौधरी ने समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ मिलाकर चुनाव लड़ने का फैसला ले लिया है। अब देखने वाली बात यह है कि अखिलेश यादव और जयंत चौधरी का गठजोड़ कितना लंबा चलेगा?
अजित सिंह की अगुवाई में विधानसभा में रालोद का श्रेष्ठ प्रदर्शन 2002 में रहा, जब पार्टी ने 16 सीटें जीतीं। तब उनका मुकाबला भाजपा से था। 2009 में भाजपा के साथ ही उन्होंने 5 लोकसभा सीटें जीती थीं। 2012 में कांग्रेस के साथ मिल विधानसभा चुनाव लड़ा और 9 पर सिमट गए। अजीत सिंह के दुर्दिन शुरू हुए वर्ष 2014 में। तब लोकसभा में खाता नहीं खुला।
रालोद-सपा को परखेगा ‘अजगर’
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक पश्चिमी यूपी में जाट, गुर्जर और मुसलमान पहले एक साथ रालोद को वोट करते नजर आते थे। इन तीनों की एकता ही रालोद की ताकत थी। लेकिन 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों, गुर्जरों और मुसलमानों को अलग कर दिया। उस समय अखिलेश यादव की सरकार थी। इस दंगे से सपा और रालोद दोनों को भारी नुकसान हुआ। 2017 के विधानसभा चुनाव में रालोद महज एक सीट जीत पाई थी। जबकि सपा 47 सीटों पर सिमट गई थी।
2019 के लोकसभा चुनाव में रालोद सपा-बसपा गठबंधन में शामिल था। चुनाव में रालोद को एक भी सीट नहीं मिली। चौ. अजित सिंह और जयंत चौधरी दोनों चुनाव हार गए। विधानसभा चुनाव के लिए अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के बीच सीटों पर समझौता गया है। जल्दी ही इसकी औपचारिक घोषणा होगी। इस चुनाव में यह सामने आएगा कि चौधरी चरण सिंह द्वारा बनाया गया अल्पसंख्यक, अहीर, जाट, गुर्जर व राजपूत (अजगर) का वोट बैंक रालोद-सपा गठबंधन को कितना समर्थन देता है। इसी से यह भी तय होगा कि क्या जयंत चौधरी अखिलेश यादव के साथ खड़े होकर पश्चिम उत्तर प्रदेश में अपनी चौधराहट कायम रख पाएंगे?
बढ़ गई है जयंत की चुनौती
वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं कि रालोद की स्थिति ‘पोजिशन ऑफ वीकनेस’ वाली हो गई है। जिस तरह के सियासी समीकरण हैं उसे देखते हुए लगता तो यही है कि आने वाले समय में सपा की ओर से उन्हें जितनी सीटें ऑफर की जाएंगी, उसे स्वीकार करने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है। वह मनमाफिक सीटें ले पाएंगे, यह लगता नहीं है। लाल का कहना है कि जयंत के दादा और पिता का पाला बदलने का इतिहास रहा है। चौ. अजित सिंह अपना कद पिता चौधरी चरण सिंह जैसा नहीं बना पाए। कभी एनडीए तो कभी यूपीए के साथ जाकर उन्होंने यही संदेश दिया कि सत्ता के साथ ही रहकर ही सियासत कर सकते हैं।
जहां तक जयंत का सवाल है तो वह भी पिता के नक्शे कदम पर ही दिखाई दे रहे हैं। एक तरह चुनाव से पहले ही उन्होेंने संदेश दे दिया कि वह गठबंधन के लिए उपलब्ध हैं। यह उनकी नेतृत्व क्षमता की कमजोरी प्रदर्शित करता है। चौ. अजित सिंह के समय में ही वेस्ट यूपी में रालोद की पकड़ कमजोर होने लगी थी। पिछले दो चुनावों के नतीजे इसका प्रमाण हैं। किसान आंदोलन खत्म होने के बाद तो जयंत की चुनौती और बढ़ गई है। ऐसे में वेस्ट यूपी में अखिलेश के साथ होने के बावजूद जयंत कोई बड़ा चमत्कार कर पाएंगे ऐसा लगता नहीं है।