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अपनी अनदेखी की पीड़ा व बेटे के भविष्य के बीच फंसे मुलायम

Sat, 04 Feb 2017 01:57 PM IST
राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
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मुलायम ‌सिंह यादव - फोटो : amar ujala
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एक तरफ अनदेखी की पीड़ा और दूसरी तरफ बेटे का सियासी भविष्य। मुलायम सिंह यादव इन्हीं के बीच उलझे हुए हैं। कड़ी मेहनत और संघर्ष से पार्टी को खड़ा करने वाले मुलायम, सपा की स्थापना के रजत जयंती वर्ष में अध्यक्ष पद से हटाए जाने से आहत हैं तो अनदेखी की पीड़ा भी है।
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वे अखिलेश यादव की अगुवाई में प्रदेश में फिर से पूर्ण बहुमत की सरकार भी देखना चाहते हैं। यही वजह है कि वे कभी चुनाव प्रचार से अलग रहने की बात करते हैं तो कभी प्रत्याशियों का प्रचार करने की।

मुलायम सिंह ने 1992 में सपा की स्थापना की थी। वे इसके संस्थापक अध्यक्ष हैं। इस साल सपा की स्थापना के 25 साल पूरे हो जाएंगे। पिछले ढाई दशक में ज्यादातर समय सपा प्रदेश की सत्ता में रही या मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में।
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दुखद पहलू यह रहा कि सपा को प्रदेश और देश में पहचान दिलाने वाले मुलायम सिंह रजत वर्ष में पार्टी के अध्यक्ष पद से हटा दिए गए। यह काम किसी और ने नहीं, उनके बेटे अखिलेश और भाई रामगोपाल यादव ने किया। विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाकर आम सहमति से पिता की जगह बेटे को सपा का अध्यक्ष चुन लिया गया।

मुलायम के लिए असहज करने वाली ‌स्थितियां हैं

- फोटो : amar ujala
अखिलेश ने मुलायम की असहमति के बावजूद कांग्रेस से गठबंधन किया, टिकट वितरण अपनी मर्जी से किया और चुनाव प्रचार की कमान भी खुद संभाल रखी है। पिछले 50 सालों से हर चुनाव में सक्रिय और अग्रिम भूमिका निभाने वाले मुलायम सिंह अभी तक इस विधानसभा चुनाव से अलग हैं। यह स्थिति उनके लिए असहज है।

अखिलेश को सौंपी सियासी विरासत
सपा के चुनाव चिह्न पर निर्वाचन आयोग का फैसला आने से पहले मुलायम सिंह ने सपा दफ्तर पहुंचकर कहा था कि 2012 में हमने सरकार बनाई। अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाया। हमारे पास जो कुछ था, उसे सौंप दिया, अब क्या बचा है। यह बात उन्होंने पीड़ा के साथ कही थी, लेकिन यह भी मान ही लिया था कि सीएम बनाते ही उन्होंने अखिलेश को विरासत सौंप दी।

अखिलेश से उनके कुछ मुद्दों पर भले ही मतभेद हों लेकिन बेटे के भविष्य को लेकर चिंतित भी रहते हैं। वे कई बार इस बात को कह चुके हैं। शुरुआती ना-नुकुर के बाद उन्होंने अखिलेश को सीएम का चेहरा बनाने और सरकार बनने पर उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की बातें सार्वजनिक तौर पर कहीं।

बुधवार को दिल्ली में उन्होंने सपा के प्रत्याशियों के लिए प्रचार करने की बात कही तो कहीं न कहीं उनके मन में सपा की सरकार और अखिलेश के सीएम बनने की चिंता रही होगी। शायद यही वजह है कि कांग्रेस से गठबंधन का विरोध करने वाले मुलायम ने यह भी कहा कि जब समझौता है तो कांग्रेस उम्मीदवारों के लिए भी वोट मांगेंगे।

करीबियों की पीड़ा पर दिखाते हैं तीखे तेवर

- फोटो : amar ujala
मुलायम के नजदीकी नेता जब अपनी उपेक्षा का रोना रोते हैं, टिकट कट जाने और पार्टी हाशिये पर डाले जाने का जिक्र करते हैं तो उनके तेवर अखिलेश के प्रति तल्ख हो जाते हैं। तब वे कहते हैं कि हमारे लोगों के टिकट काट दिए। वे पांच साल क्या करेंगे?

कांग्रेस से गठबंधन हमारी इच्छा के खिलाफ हुआ है। ऐसे मौकों पर वे चुनाव प्रचार से दूर रहने, कांग्रेस के हिस्से में आई सीटों पर सपा नेताओं से निर्दलीय चुनाव लड़ने की अपील तक कर डालते हैं।

... प्रचार करेंगे लेकिन चुनिंदा सीटों पर
पार्टी के सूत्र बताते हैं कि मुलायम सक्रिय चुनाव प्रचार नहीं करेंगे। तीन महीने पहले उन्होंने हर मंडल में रैली की योजना बनाई थी। लेकिन अब वे परिवार के सदस्यों शिवपाल सिंह यादव (जसवंत नगर), अनुराग यादव (सरोजनी नगर) और लखनऊ कैंट से अपर्णा के अलावा प्रदेश की चुनिंदा सीटों पर ही प्रचार के लिए जाएंगे।

ऐसी सीटों में आजम खां के रामपुर, माता प्रसाद पांडेय के इटवा (सिद्धार्थनगर) और अपने संसदीय क्षेत्र आजमगढ़ की सीटें शामिल हो सकती हैं। सपा उनके सांकेतिक चुनाव प्रचार को भी अपने लिए मददगार मान रही है।
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मुलायम का स्टैंड समझ से परे

- फोटो : amar ujala
लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. एसके द्विवेदी कहते हैं कि मुलायम सिंह गंभीर राजनेता हैं। उन्होंने सपा की स्थापना की, उसे ऊंचाइयों पर पहुंचाया। पर, पिछले कुछ समय से उनके बयान आश्चर्यचकित करने वाले हैं। उनका स्टैंड समझे से परे है।

वे कभी अखिलेश को दिल से आशीर्वाद देते दिखते हैं तो कभी उनके विरोध में खड़े होते प्रतीत होते हैं। दार्शनिक अरस्तू व्यवहार, आचरण, पतन और विकास में परिवार के विवाद को अहम वजह मानते थे।

मुलायम के रुख पर भी परिवार के विवाद की छाया दिखती है। यह स्थिति सपा के लिए दुखद है और हानिकारक भी। कांग्रेस से गठबंधन सपा के लिए वक्त की जरूरत थी। अखिलेश यादव ने इसे समझ लिया है। यह भी वक्त की जरूरत है कि पुरानी बातों को भूलकर मुलायम, अखिलेश को आशीर्वाद दें।
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