उन्होंने कहा, ’जब बेगम साहिबा डोली का परदा भी नहीं हटाएंगी तो मेरे जाने से क्या फायदा। ये धागा ले जाओ और उनकी कलाई की सही नाप ले आओ। मैं उसी से मर्ज पहचान लूंगा।’ गुमाश्ते नाप लेकर अंदर गए। वैद्य जी ने देखा तो समझ गए कि यह किसी पुरुष या महिला की कलाई नहीं बल्कि किसी जानवर का पैर है।
उन्होंने नुस्खा लिखा, ‘मरीज को थोड़े भीगे हुए चने और हरी घास खिलाओ। मरीज ठीक हो जाएगा।’ वैद्यराज ने सही पहचाना था। डोली में बेगम साहिबा नहीं बल्कि बकरी थी। नवाब साहब इससे बहुत खुश हुए और वैद्यराज को तमाम उपहार दिए।