यूपी के राज्यपाल राम नाईक से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के बीच संबंध कैसे हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब मुख्यमंत्री विदेश यात्रा से लौटकर आते हैं तो वह राज्यपाल को सेंट की बोतल भेंट करते हैं। मसला यहीं तक नहीं है सपा सुप्रीमो राजभवन पहुंचते हैं और राज्यपाल को अपना सालों पुराना साथी बताते हैं।
राज्यपाल और आजम खां के बीच जुबानी और पत्रों के बीच जो भी चलता रहे अखिलेश ने इस मसले पर कभी भी खुलकर कोई बयान नहीं दिया। कोशिश हमेशा यही रही कि 'आपस के संबंध' अच्छे बने रहें।
लेकिन दो ऐसे मसले हैं जब राजभवन और मुख्यमंत्री आवास के बीच के संबंध बेहद तल्ख हो जाते हैं। पहला मसला सरकार के मनचाहे एमएलसी की नियुक्ति का है और दूसरा मसला लोकायुक्त का। इन दोनों ही मामलों में राज्यपाल और मुख्यमंत्री एक-दूसरे की बात को काटने के लिए अपनी संवैधानिक शक्तियों का भरपूर इस्तेमाल करते हैं।
राज्य सरकार जिन चेहरों को विधान परिषद भेजना चाहती है उन पर ज्यादातर में राज्यपाल को ऐतराज है। सरकार द्वारा एमएलसी के लिए भेजे गए 9 नामों में से राज्यपाल ने सिर्फ चार पर सहमति दी है। एसआरएस यादव, लीलावती कुशवाहा, रामवृक्ष यादव और जीतेंद्र यादव के अलावा जो पांच और नाम हैं उन पर राजभवन को गहरी आपत्ति है।
राज्यपाल राम नाईक का कहना है कि कमलेश कुमार पाठक, संजय सेठ, रणविजय सिंह, अब्दुल सरफराज खां और राजपाल कश्यप कश्यप के बैकग्राउंड के पड़ताल के बाद ही इन नामों पर वह स्वीकृति देंगे। जबकि सरकार इनको विधान परिषद भेजने का मन बना चुकी है। राज भवन से अब तक इन नामों पर सहमति नहीं लगाई गई है।