सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने एक बार फिर रामनगरी अयोध्या की यादों में छह दिसंबर 1992 का परिदृश्य ताजा कर दिया है। यहां विवादित ढांचा ही नहीं टूटा था, बल्कि आध्यात्मिकता के केंद्र रामकोट क्षेत्र का वैभव भी प्रभावित हुआ था, जिसका असर आज तक दिख रहा है। हालांकि अब अयोध्या 24 साल पहले का वह मंजर भूलकर अमन और तरक्की की राह देख रही है। कोई नहीं चाहता वह मंजर दोहराया जाए।
विवादित परिसर को समेटे रामकोट क्षेत्र के रामकथा कुंज की छत पर छह दिसंबर 1992 को लालकृष्ण आडवाणी, कल्याण सिंह, अशोक सिंहल, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, ऋतंभरा, विनय कटियार सरीखे नेता बाबरी ढांचा ढहाने की ललकार लगाने व साजिश रचने वालों में प्रमुख आरोपी हैं। यहीं रामलला का विवादित गर्भगृह स्थित है।
पहले बाहर से अयोध्या आने वाले श्रद्धालुओं के लिए दर्शन का मुख्य केंद्र यही था, मगर अब यह संगीनों के साए में है। यहां रामलला का विवादित गर्भगृह स्थित है, तो दर्जनभर ऐसे मंदिर भी हैं, जिनकी आध्यात्मिक आभा श्रद्धालुओं को बरबस खींच लाती थी।
रंगमहल मंदिर के महंत रामशरण दास कहते हैं कि रामकोट स्थित मानस भवन, रंगमहल, रामजन्म स्थान, राम खजाना, रामनिवास मंदिर, कैकेयी कोप भवन, सीता रसोई, लवकुश मंदिर, आनंद भवन, शृंगार भवन, कोहबर भवन, रामकृष्ण मंदिर, रंगजी का मंदिर वीरानी का दंश झेल रहे हैं। अधिग्रहण की सख्ती से आम श्रद्धालु नहीं पहुंच पाते, इससे मंदिरों में राग-भोग, आरती सेवा प्रभावित है। अब मामले का हल होना जरूरी है, ताकि भक्तों के आने व ठहरने से राम की अयोध्या का पुराना वैभव हासिल हो सके।