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एक फैसले से 24 साल पुरानी यादें ताजा, क्या हुआ था 6 दिसंबर 1992 को?

Thu, 20 Apr 2017 09:42 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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राम जन्मभूमि गर्भगृह व ध्वस्त होने के बाद ढांचा - फोटो : amar ujala
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सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने एक बार फिर रामनगरी अयोध्या की यादों में छह दिसंबर 1992 का परिदृश्य ताजा कर दिया है। यहां विवादित ढांचा ही नहीं टूटा था, बल्कि आध्यात्मिकता के केंद्र रामकोट क्षेत्र का वैभव भी प्रभावित हुआ था, जिसका असर आज तक दिख रहा है। हालांकि अब अयोध्या 24 साल पहले का वह मंजर भूलकर अमन और तरक्की की राह देख रही है। कोई नहीं चाहता वह मंजर दोहराया जाए।
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विवादित परिसर को समेटे रामकोट क्षेत्र के रामकथा कुंज की छत पर छह दिसंबर 1992 को लालकृष्ण आडवाणी, कल्याण सिंह, अशोक सिंहल, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, ऋतंभरा, विनय कटियार सरीखे नेता बाबरी ढांचा ढहाने की ललकार लगाने व साजिश रचने वालों में प्रमुख आरोपी हैं। यहीं रामलला का विवादित गर्भगृह स्थित है।

पहले बाहर से अयोध्या आने वाले श्रद्धालुओं के लिए दर्शन का मुख्य केंद्र यही था, मगर अब यह संगीनों के साए में है। यहां रामलला का विवादित गर्भगृह स्थित है, तो दर्जनभर ऐसे मंदिर भी हैं, जिनकी आध्यात्मिक आभा श्रद्धालुओं को बरबस खींच लाती थी।
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रंगमहल मंदिर के महंत रामशरण दास कहते हैं कि रामकोट स्थित मानस भवन, रंगमहल, रामजन्म स्थान, राम खजाना, रामनिवास मंदिर, कैकेयी कोप भवन, सीता रसोई, लवकुश मंदिर, आनंद भवन, शृंगार भवन,  कोहबर भवन, रामकृष्ण मंदिर, रंगजी का मंदिर वीरानी का दंश झेल रहे हैं। अधिग्रहण की सख्ती से आम श्रद्धालु नहीं पहुंच पाते, इससे मंदिरों में राग-भोग, आरती सेवा प्रभावित है। अब मामले का हल होना जरूरी है, ताकि भक्तों के आने व ठहरने से राम की अयोध्या का पुराना वैभव हासिल हो सके।

'फिर वैसा दिन न देखने को मिले, यही दुआ है'

विवादित ढाचा विध्वंस - फोटो : amar ujala
टेढ़ी बाजार कजियाना की ताहिरा बानो स्कूल से घर लौटी हैं। छह दिसंबर 1992 को अपने शिक्षक पति शौकतउल्ला व इकलौते मासूम बेटे इजार मोहम्मद को खोने वाली ताहिरा का दर्द सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ताजा हो जाता है। वे कहती हैं, इंसाफ की उम्मीद अल्लाह पर छोड़ दी है। फिर वैसा दिन देखने को न मिले, यही दुआ रोज करती हूं।

इनकी 8 बेटियां हैं, जिनमें दो की शादी होनी बाकी है। वे कहती हैं कि बच्चे अब दर्द भूल तरक्की की राह देख रहे हैं। यह हाल केवल कजियाना मोहल्ले का नहीं है, बल्कि कटरा, धर्मकांटा, रायगंज, गोड़ियाना, सुटहटी आदि का भी है, जहां दर्जनों घरों में आगजनी और मौत का तांडव हुआ था। ये इलाके विवादित परिसर से दो सौ मीटर पर हैं। अधिकतर की रोजी-रोटी मंदिरों में फूल-मालाएं बनाने से लेकर प्रसाद के डिब्बे व खड़ाऊं बनाने से चलती है।

सुटहटी मोहल्ले में गरीबुल निशां और उनकी बेटी नाजरा बानो आज भी फूलों की मालाएं तैयार कर रही हैं। ये मालाएं हनुमान गढ़ी जाती हैं। उनके बराबर में कासिम के घर में प्रसाद के लिए गत्ते के डिब्बे तैयार हो रहे हैं। ये भी हनुमान गढ़ी जाएंगे। सबकी उम्मीद है कि अयोध्या में जितने अधिक लोग आएंगे, उतनी ही उनकी तरक्की होगी। सियासी हलचल की सुर्खियां बनने वाली अयोध्या में जोश-आवेश और विद्वेष के बजाय अब कसक तरक्की और विकास की है।

ऐसा था 6 दिसंबर 1992 का मंजर

राम जन्मभूमि गर्भगृह व मौके पर मौजूद सुरक्षा के जवान। - फोटो : amar ujala
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक 6 दिसंबर 1992 की सुबह सब कुछ सामान्य था। विवादित 2.77 एकड़ जमीन पुलिस और आरएसएस के स्वयंसेवकों के घेरे में थी। सिर्फ संतों और पत्रकारों को ही अंदर जाने की अनुमति थी। करीब 11 बजे पहली बार उत्तेजित कारसेवकों ने इस घेरे को तोड़कर अंदर आने की कोशिश की लेकिन उन्हें रोक दिया गया।

कुछ मिनटों बाद वहां विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन महामंत्री अशोक सिंहल आए। उनके साथ भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी भी थे। थोड़ी देर बाद हलचल मची। इस दौरान भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी भी आ गए।
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...और घेरा तोड़कर अंदर घुसे कारसेवक

विवादित ढाचा ध्वस्त होने के बाद मौके का दूश्य। - फोटो : amar ujala
इस बीच वहां जमा कारसेवकों ने एक बार फिर घेरा तोड़कर अंदर घुसने की कोशिश की लेकिन पुलिस ने उनकी कोशिश नाकाम कर दी। इस जगह से थोड़ी दूर सीता रसोई की छत पर राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी और सुप्रीम कोर्ट के पर्यवेक्षक मौजूद थे। थोड़ी देर बाद कारसेवकों का एक भारी रेला फिर आगे आया। वहां पीली पट्टी बांधे खास दस्ता कारसेवकों को समझाने लगा। तभी विवादित ढांचे के अंदर से पुलिस की टुकड़ी बाहर आ गई।

विवादित परिसर के घेरे से लोगों पर जोर-जोर से पत्थरबाजी शुरू हो गई। इससे कारसेवक बेकाबू हो गए और भीड़ बाड़े को तोड़ने लगी। बचे-खुचे वर्दीवाले भी वहां से भाग खड़े हुए। न कोई फायरिंग न कोई लाठीचार्ज और न ही आंसू गैस। बेकाबू भीड़ लोहे के पाइप और छड़ें लेकर ढांचे पर हमला बोल चुकी थी। तभी शंखनाद की आवाज सुनाई पड़ी।

मस्जिद के गुंबद पर कारसेवकों का एक जत्था चढ़ आया और कुदाल, फावड़े व लोहे की छड़ों से ढांचे पर वार करने लगा। चार बजे तक पूरा ढांचा गिरा दिया गया।
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