लखनऊ। राजधानी के औद्योगिक क्षेत्रों में वायु प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा है। सबसे ज्यादा प्रदूषण अमौसी, उसके बाद तालकटोरा और सरोजनीनगर में पाया गया है। उद्यमी इसे फैक्ट्रियों की बजाय जाम और उखड़ी सड़कों से उड़ती धूल का नतीजा बता रहे हैं। नगर निगम की ओर से पानी का छिड़काव किया जा रहा है, लेकिन हालात में सुधार नहीं हुआ है। वहीं, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने तालकटोरा की दो इंडस्ट्री को नोटिस जारी किया है।
भारतीय अनुसंधान संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार, लखनऊ का सबसे प्रदूषित औद्योगिक इलाका अमौसी है। यहां पीएम-10 का औसत स्तर 141.3 और पीएम-2.5 का स्तर 133.8 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया, जो राष्ट्रीय मानक (100 और 60 माइक्रोग्राम) से कहीं अधिक है।
रिमोट सेंसिंग एप्लिकेशन सेंटर के सर्वे में भी तालकटोरा, अमौसी, सरोजनीनगर और नादरगंज की हवा बेहद खराब श्रेणी में पाई गई है। इन क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) अकसर 400 या उससे अधिक दर्ज होता है। शुक्रवार को भी सभी औद्योगिक इलाकों में एक्यूआई 200 के पार रहा।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी जेपी मौर्य ने बताया कि तापमान गिरने से हवा में मौजूद प्रदूषक तत्व ऊपर नहीं उठ पाते, जिससे प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। उन्होंने स्वीकार किया कि इंडस्ट्री के अलावा वाहनों की बढ़ती संख्या और सड़कों से उड़ती धूल भी बड़ी वजह हैं।
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उद्यमी बोले- इंडस्ट्री नहीं, जाम और टूटी सड़कें हैं दोषी
तालकटोरा औद्योगिक क्षेत्र के उद्यमियों का कहना है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड गलत दिशा में उंगली उठा रहा है। इंडस्ट्री से ज्यादा प्रदूषण सड़कों की बदहाली और ट्रैफिक जाम से फैल रहा है। यही नहीं, जिस स्थान पर तालकटोरा में प्रदूषण मापक यंत्र लगा है, वहां की सड़क भी बुरी तरह टूटी हुई है। दो दिन पहले बोर्ड ने तालकटोरा की दो इंडस्ट्री को नोटिस जारी किया था, यह कहते हुए कि उन्होंने स्क्रबर नहीं चलाया। उद्यमियों ने बताया कि स्क्रबर वह यंत्र है, जिसमें लगातार बहते पानी के जरिये चिमनियों से निकलने वाले धुएं की गंदगी सोख ली जाती है, लेकिन उनका कहना है कि यहां ऐसी कोई इंडस्ट्री नहीं है, जिससे वायु प्रदूषण का स्तर इतना बढ़े।
तालकटोरा के उद्यमी यूनुस सिद्दीकी और दिनेश गोस्वामी ने बताया कि तुलसीदास मार्ग पर अतिक्रमण के कारण जाम लगता है। बालाजी मंदिर के पास हर वक्त सैकड़ों गाड़ियां फंसी रहती हैं, जिससे लगातार धुआं निकलता है। उन्होंने बताया कि औद्योगिक क्षेत्र की ज्यादातर सड़कें तीन साल से टूटी पड़ी हैं। मरम्मत का काम स्वीकृत होने के बावजूद शुरू नहीं हुआ। यदि सड़कें बन जाएं तो धूल उड़ना काफी कम हो जाएगा।
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अमौसी में भी धूल और कंस्ट्रक्शन मुसीबत
अमौसी इंडस्ट्रियल एरिया के महासचिव रजत मेहरा ने कहा कि यहां कोई ऐसी इंडस्ट्री नहीं है जो ईंधन जलाती हो। सभी सर्विस या नॉन-पॉल्यूटिंग यूनिट हैं। प्रदूषण की वजह इंडस्ट्री नहीं, बल्कि चल रहा कंस्ट्रक्शन और उखड़ी सड़कों से उड़ती धूल है। नादरगंज की मुख्य सड़क भी अभी आधी ही बनी है, जिससे धूल का स्तर बढ़ रहा है।
अमौसी इलाके में उड़ती धूल, पेड़ों पर जमा धूल और कूड़े से उठता धुआं।
अमौसी इलाके में उड़ती धूल, पेड़ों पर जमा धूल और कूड़े से उठता धुआं।
अमौसी इलाके में उड़ती धूल, पेड़ों पर जमा धूल और कूड़े से उठता धुआं।
अमौसी इलाके में उड़ती धूल, पेड़ों पर जमा धूल और कूड़े से उठता धुआं।
अमौसी इलाके में उड़ती धूल, पेड़ों पर जमा धूल और कूड़े से उठता धुआं।
अमौसी इलाके में उड़ती धूल, पेड़ों पर जमा धूल और कूड़े से उठता धुआं।