शासन ने वित्तविहीन मान्यता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाचार्यों, शिक्षकों और कर्मचारियों को मानदेय देने के लिए नियम-कायदे तय कर दिए हैं।
जुलाई-2013 तक नियुक्ति पाने वाले शिक्षिकों और कर्मचारियों को इस योजना का लाभ मिलेगा। प्रधानाचार्यों और शिक्षकों को प्रति माह एक हजार रुपये, जबकि कर्मचारियों को 500 रुपये मानदेय मिलेगा।
सितंबर से भुगतान के लिए उच्चस्तर पर सहमति बन चुकी है। सिर्फ मुख्य सचिव की ओर से औपचारिक आदेश जारी होना बाकी रह गया है।
सत्ताधारी समाजवादी पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में वित्तविहीन माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों को मानदेय देने की घोषणा की थी। चुनावी वेला में इस पर अमलीजामा पहनाने के लिए नीति तैयार कर ली गई है।
पहले ही दे दिए गए थे 200 करोड़
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हालांकि, राज्य सरकार ने इस मद में 200 करोड़ रुपये पहले ही दे दिया था। यहां बता दें कि प्रदेश में 19 हजार वित्तविहीन मान्यता प्राप्त माध्यमिक विद्यालय हैं। इनमें 2 लाख 40 हजार 435 शिक्षक व प्रधानाचार्य और 38 हजार तृतीय व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी कार्यरत हैं।
तैयार की गई नीति के अनुसार, तीन लगातार सत्रों से कार्यरत शिक्षकों और कर्मचारियों को योजना का लाभ दिया जाएगा। यानी, जुलाई-2013 तक नियुक्ति पाए लोग लाभ के दायरे में आएंगे।
इंटरमीडिएट एक्ट में निर्धारित योग्यता का पालन करने वाले शिक्षक ही मानदेय के लिए पात्र होंगे। प्रत्येक वित्तविहीन स्कूल में शिक्षकों और कर्मचारियों की संख्या के निर्धारण के लिए समय-समय पर राजकीय स्कूलों के लिए जारी शासनादेश लागू होगा।
अधिकारियों के मुताबिक, अगले दो-तीन दिन में नीति संबंधी
औपचारिक आदेश जारी कर दिया जाएगा। माध्यमिक शिक्षा विभाग को सितंबर से भुगतान के लिए तैयारियां पूरी कर लेने के निर्देश भी दे दिए गए हैं।
इस पर प्रमुख सचिव माध्यमिक शिक्षा जितेंद्र कुमार का कहना हे कि वित्तविहीन स्कूलों के शिक्षकों और कर्मचारियों को मानदेय के भुगतान संबंधी जरूरी प्रक्रियाएं 31 अगस्त तक पूरी कर ली जाएंगी। इसके लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया गया है।
मानदेय के जल्द भुगतान के लिए धरना आज
मानदेय के भुगतान के लिए माध्यमिक वित्तविहीन शिक्षक महासभा एक अगस्त को माध्यमिक निदेशक कार्यालय पर धरना देगी।
एमएलसी उमेश द्विवेदी ने कहा कि विभाग की तैयारियों को देखते हुए नहीं लग रहा है कि अगले दो महीनों में भी भुगतान की प्रक्रिया शुरू हो पाएगी। इसलिए बाध्य होकर महासभा को आंदोलन का फैसला लेना पड़ा।