विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष और प्रदेश सरकार में पिछड़ा एवं दिव्यांग जन कल्याण मंत्री ओमप्रकाश राजभर को तुरंत मंत्रिमंडल से बर्खास्त करने की मांग की है।
कहा है कि कैबिनेट मंत्री राजभर की मंदिर निर्माण और संतों को लेकर की गई टिप्पणी बर्दाश्त के बाहर है। इस पर मौन नहीं रहा जा सकता। राजभर, सरकार की पीठ में खंजर घोंप रहे हैं। इस तरह का काम विभाजनकारी मानसिकता का व्यक्ति ही कर सकता है।
अशिष्ट व्यक्ति की कर सकता है ऐसी टिप्पणी
विहिप के मीडिया प्रभारी शरद शर्मा ने बृहस्पतिवार को जारी बयान में कहा कि साधु-संतों पर इस तरह की अमर्यादित टिप्पणी कोई अशिष्ट व्यक्ति ही कर सकता है।
राजभर अपनी मर्यादा खो चुके हैं। एक संत के नेतृत्व में चल रही सरकार में होते हुए भी साधु-संतों को लेकर ऐसी अपमानजनक टिप्पणी उनकी घटिया सोच और निर्लज्जता को ही प्रकट करती है।
बर्खास्तगी से कम स्वीकार नहीं
शर्मा ने कहा कि श्रीराम जन्मभूमि पर विराजमान रामलला के भव्य मंदिर निर्माण को राजनीतिक चश्मे से देखना ही करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक परंपराओं पर हमला है।
जिस धार्मिक और सांस्कृतिक आंदोलन को संतों ने निस्वार्थ चलाया उसको रोजी-रोटी से जोड़ने का बयान देने वाले मंत्री राजभर की सरकार से बिदाई नहीं की गई तो संतों-धर्माचार्यों और हिंदू संगठनों का आक्रोश बढ़ेगा। राजभर की बर्खास्तगी से कम कुछ भी स्वीकार नहीं है।
कोई ताकत मंदिर का निर्माण नहीं रोक सकती
शर्मा ने कहा कि श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण तो होकर ही रहेगा। उसे कोई नहीं रोक सकता। मार्ग में अवरोधक बनने वाले राजभर जैसों को भी रामभक्त हनुमान हटाते जाएंगे।
इस बीच, विहिप ने 25 नवंबर की धर्मसभा के बाद मुख्यमंत्री योगी से मिलकर राजभर को बर्खास्त करने की मांग करने का फैसला किया है। जरूरत पड़ने पर राजभर के खिलाफ प्रदर्शन का भी निर्णय किया गया है।
क्या कहा था राजभर ने
ओम प्रकाश राजभर ने कहा था, ‘साधु-संत राम मंदिर का राग सिर्फ इसलिए अलापते हैं क्योंकि इससे उनकी रोजी-रोटी चलती है और उनका पेट भरता है। ये न तो खेती करते हैं और न ही मेहनत का कोई दूसरा काम। उनकी आमदनी का कोई दूसरा जरिया भी नहीं होता।
इसलिए वह मंदिर राग अलापकर अपनी रोजी-रोटी का इंतजाम करते रहते हैं। मंदिर को लेकर उनके मन में कोई आस्था नहीं होती। गीता में साफ तौर पर लिखा है कि माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ी ईश्वर भक्ति है।
इसलिए वह कभी मंदिर निर्माण की बात नहीं करते और अपने माता-पिता की सेवा करके ही ईश्वर की प्राप्ति कर लेते हैं। मंदिर के नाम पर रोज आवाज उठाने वालों को भी गीता के इसी संदेश पर अमल करना चाहिए।
मंदिर जाने से किसी को स्वर्ग थोड़े ही मिल जाता है। मेरी बात से यदि साधु-संत नाराज होते हैं तो भी कोई फिक्र नहीं। नाराज होकर भी वह मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते।